पाली भाषा में दूसरी पिछड़ी जातियों (OBC) के बारे में क्या-क्या बताया गया है ?
पालि साहित्य (जो मुख्य रूप से ईसा पूर्व छठी शताब्दी से लेकर आरंभिक सदियों के भारत का चित्र प्रस्तुत करता है) में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, जातियों के विभाजन और उत्पादक व श्रमजीवी वर्गों की स्थिति का विस्तृत और व्यावहारिक विवरण मिलता है।
वैदिक/संस्कृत ग्रंथों में जहाँ वर्ण-व्यवस्था को धार्मिक और दैवीय रूप में प्रस्तुत किया गया है, वहीं पालि साहित्य इसे एक **सामाजिक और आर्थिक यथार्थ** के रूप में देखता है और इस पर खुलकर चर्चा करता है।
पालि ग्रंथों (जैसे *दीघ निकाय*, *मज्झिम निकाय*, *सुत्तनिपात*, और *जातक कथाएँ*) में वर्तमान की पिछड़ी जातियों (OBC/उत्पादक वर्गों) और उनके सामाजिक-आर्थिक शोषण से संबंधित मुख्य बातें इस प्रकार दर्ज हैं:
### 1. उत्पादक और पेशेवर जातियों की सामाजिक स्थिति
पालि साहित्य में तत्कालीन समाज के विभिन्न व्यवसाय करने वाले लोगों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिन्हें आज मुख्य रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की श्रेणियों में देखा जाता है:
* **कस्सक (कृषक/किसान):** पालि ग्रंथों में खेती करने वाले विशाल वर्ग को 'कस्सक' कहा गया है। सुत्तनिपात के *कासीभारद्वाज सुत्त* में कृषि के महत्व और किसानों के जीवन का वर्णन है।
* **गोपालक (पशुपालक/यादव/अहीर वर्ग):** गायों और मवेशियों का पालन करने वाले वर्ग का उल्लेख कई सुत्तों में आता है।
* **कम्मकार और नच्चक (शिल्पी और कलाकार):**
* *नहापित* (नाई/हजाम)
* *कुंभकार* (कुम्हार)
* *तंतवाय* (बुनकर/कोरी/मोमिन)
* *कमकार* (लोहार/दस्तकार)
* *तच्छक* (बढ़ई/काष्ठकार)
* *मालाकार* (माली)
पालि साहित्य में इन उत्पादक वर्गों को **'हीन सिप्प' (छोटे/निम्न पेशे)** और इनके काम को सामाजिक पदानुक्रम में निचला दर्जा दिए जाने का जिक्र मिलता है।
### 2. वर्ण-व्यवस्था का जन्म आधारित भेदभाव और शोषण
पालि ग्रंथों से यह स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समाज में ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा जन्म के आधार पर श्रेष्ठता तय की जाती थी, जिससे उत्पादक और श्रमजीवी वर्गों का शोषण और अपमान होता था:
* **'हीन जच्चा' (निम्न जन्म):** *मज्झिम निकाय* के *अस्सलायन सुत्त* और *माधुरिय सुत्त* में उल्लेख है कि उच्च वर्ण के लोग किसानों, कारीगरों और मजदूरों को 'हीन जच्चा' (निम्न जाति/जन्म वाले) मानकर उनसे सामाजिक दूरी बनाते थे और उन्हें नीचा दिखाते थे।
* **श्रम का शोषण (भृतक और दास):** *दीघ निकाय* के *सिगालोवाद सुत्त* में बुद्ध यह चेतावनी देते हैं कि मालिकों (श्रेष्ठियों/स्वामियों) द्वारा मजदूरों (कम्मकार) और दासों से क्षमता से अधिक काम लेना, उन्हें उचित मजदूरी न देना और बीमारी में उनकी देखभाल न करना एक बड़ा सामाजिक शोषण था। इससे पता चलता है कि तत्कालीन समय में मेहनतकश वर्ग का आर्थिक शोषण व्यापक था।
* **ज्ञान और धर्म के अधिकार से वंचित करना:** पालि साक्ष्यों के अनुसार, जन्म के आधार पर शूद्रों और उत्पादक वर्गों को धार्मिक ज्ञान, यज्ञों और उच्च सामाजिक सभाओं से बाहर रखा जाता था।
### 3. पालि साहित्य में शोषण के खिलाफ बौद्ध क्रांति और तर्क
पालि साहित्य केवल शोषण का वर्णन ही नहीं करता, बल्कि **जन्म आधारित जाति-प्रथा और शोषण का कड़ा खंडन** भी करता है:
* **जन्म नहीं, कर्म ही मुख्य है:** *सुत्तनिपात* के *वासल सुत्त* में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
> **"न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो।**
> **कम्मना वसलो होति, कम्मना होति ब्राह्मणो॥"**
> *(कोई भी व्यक्ति जन्म से नीच/शूद्र नहीं होता और न ही जन्म से ब्राह्मण होता है। व्यक्ति अपने कर्मों से ही नीच या श्रेष्ठ बनता है।)*
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* **समानता का सिद्धांत (समुद्र का उदाहरण):** *अंगुत्तर निकाय* में बुद्ध समाज की जातियों की तुलना नदियों से करते हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार गंगा, यमुना, अचिरवती आदि नदियाँ समुद्र में गिरने के बाद अपना पुराना नाम और पहचान खोकर एक हो जाती हैं, उसी प्रकार क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र संघ में प्रवेश करने के बाद अपनी जाति खोकर केवल 'श्रमण' बन जाते हैं।
* **पेशेवर जातियों को संघ में सर्वोच्च स्थान:** पालि ग्रंथों में ऐसे कई उदाहरण दर्ज हैं जहाँ तथाकथित 'निम्न/पिछड़ी' जातियों के लोगों को संघ में उच्च स्थान दिया गया:
* **उपालि:** जो जाति से नाई (नहापित) थे, वे बुद्ध के संघ में विनय (नियमों) के सबसे बड़े ज्ञाता बने और महान बौद्ध आचार्यों में गिने गए।
* **पुण्णा और पुण्णिका:** दास और मजदूर वर्ग की महिलाओं को भी 'थेरीगाथा' में अपने विचार और कविताएँ दर्ज करने का अधिकार मिला।
### 4. दशरथ जातक और लोक कथाओं में लोक-संस्कृति
पालि *जातक कथाओं* (जैसे *मातंग जातक*, *चित्त-संभूत जातक*) में साधारण जनता, किसानों, कारीगरों और दमित वर्गों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी, उनके संघर्षों और उच्च वर्णों द्वारा उनके साथ किए जाने वाले अन्यायों के अनेक आख्यान मिलते हैं। इन कथाओं में दिखाया गया है कि कैसे अपनी मेहनत और योग्यता के बावजूद मेहनतकश वर्गों को सामाजिक अपमान सहना पड़ता था और बुद्ध मार्ग ने उन्हें आत्मसम्मान दिया।
### निष्कर्ष
पालि साहित्य प्राचीन भारत का वह ऐतिहासिक दस्तावेज़ है जो यह साबित करता है कि **भारत की उत्पादक, शिल्पी और श्रमजीवी जातियाँ (जो आज OBC और बहुजन वर्ग में आती हैं) ही समाज की असली आर्थिक रीढ़ थीं।** पालि ग्रंथ इस बात के प्रामाणिक साक्ष्य हैं कि इस वर्ग को जन्म के आधार पर दबाया जाता था और पालि साहित्य ही सबसे पहला भारतीय साहित्य है जिसने इस सामाजिक व आर्थिक शोषण के खिलाफ समानता, बंधुत्व और मानवीय गरिमा की आवाज उठाई।
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