विश्व में सबसे पुराना सनातन धर्म मैं बाद में जन्म से वर्ण व्यवस्था मान लेना के कारण और अन्य धर्मो की उत्पत्ति?
समय बोलता हे कि इस बात में एक बहुत ही व्यावहारिक और यथार्थवादी अवलोकन है। इतिहास और समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि मानव समाज में असमानता और वर्ग/जाति भेद एक बहुत ही जटिल समस्या रही है, जिसे खत्म करना इतना आसान नहीं रहा।
उपरोक्त विषयों का क्रमबद्ध और विश्लेषणात्मक विश्लेषण:
### 1. सनातन धर्म में जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था का आना
प्राचीन वैदिक काल में 'वर्ण' का अर्थ मुख्य रूप से **गुण, कर्म और स्वभाव (व्यावसायिक चयन)** पर आधारित था। *श्रीमद्भगवद्गीता* में भी कहा गया: **"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः"** (अर्थात् चारों वर्णों की रचना गुण और कर्म के विभाजन के आधार पर हुई है, जन्म से नहीं)।
**जन्म आधारित बनने के मुख्य कारण:**
* **पेशेवर विशेषाधिकार व एकाधिकार (Monopoly):** समय के साथ परिवारों ने अपने ज्ञान, हुनर (जैसे शिल्प, युद्ध कला, या धार्मिक अनुष्ठान) और संसाधनों को अपने ही बच्चों तक सीमित रखना शुरू कर दिया।
* **सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा:** प्राचीन काल में किसी विशेष समूह/जाति का हिस्सा होना सुरक्षा और आजीविका की गारंटी देता था।
* **धर्मशास्त्रों का उत्तरकालीन कठोर रूप:** *मनुस्मृति* जैसे उत्तरकालीन स्मृति ग्रंथों और सामाजिक संहिताओं ने धीरे-धीरे जन्म को ही वर्ण का एकमात्र पैमाना बना दिया। इससे जो व्यवस्था कभी लचीली (कर्म आधारित) थी, वह कठोर (जन्म आधारित जाति-प्रथा) में बदल गई और उत्पादक व श्रमजीवी वर्गों का सामाजिक शोषण होने लगा।
### 2. अन्य धर्मों का उदय और समानता का प्रयास
जब सनातन समाज में जन्म आधारित ऊँच-नीच और कर्मकांड अत्यधिक हावी हो गए, तब सामाजिक सुधार और समानता के संदेश के साथ नए धर्मों और आंदोलनों का जन्म हुआ:
* **बौद्ध और जैन धर्म (ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी):** इन्होंने जन्म आधारित श्रेष्ठता को पूरी तरह खारिज किया। बुद्ध और महावीर ने कहा कि व्यक्ति अपने कर्मों से महान या नीच बनता है। पालि साहित्य में जातियों के शोषण के खिलाफ स्पष्ट तर्क मिलते हैं।
* **ईसाई धर्म (2000 वर्ष पूर्व) और इस्लाम (1400 वर्ष पूर्व):** इन धर्मों ने ईश्वर के सामने सभी मनुष्यों की पूर्ण समानता का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस्लाम में 'उम्मा' (एक समान समुदाय) और ईसाई धर्म में 'ईश्वर की संतान' की अवधारणा से सामाजिक भेदभाव मिटाने की कोशिश की गई।
* **सिख धर्म (15वीं शताब्दी):** गुरु नानक देव जी और अन्य सिख गुरुओं ने जाति-प्रथा पर सीधा प्रहार किया। **'संगत'** (एक साथ बैठना) और **'लंगर'** (एक साथ बैठकर भोजन करना) की व्यवस्था इसीलिए बनाई गई ताकि राजा, रंक, ब्राह्मण और शूद्र का भेद खत्म हो सके।
### 3. प्रयासों के बावजूद यह व्यवस्था पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हुई?
जैसा कि आपने सही कहा, इन सभी धर्मों और सुधारवादी आंदोलनों के बावजूद सामाजिक पदानुक्रम और भेद-भाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाए। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
* **धर्म परिवर्तन के बाद भी सांस्कृतिक और सामाजिक निरंतरता:**
जब भारत में किसी वर्ग के लोगों ने बौद्ध, सिख, ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाया, तो उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान तो बदल ली, लेकिन उनका **सामाजिक और आर्थिक ढाँचा (वैवाहिक संबंध, पेशे)** पुराना ही रहा।
* उदाहरण के लिए, दक्षिण एशिया में इस्लाम अपनाने के बाद भी *अशराफ* (उच्च वर्ग/विदेशी मूल) और *अजलाफ/अरजाल* (स्थानीय धर्मांतरित पिछड़े व दलित वर्ग) का भेद बना रहा।
* सिख धर्म में जाति-विरोधी सिद्धांतों के बावजूद *जट, मजहबी, रामगढ़िया* आदि सामाजिक श्रेणियां वैवाहिक संबंधों में आज भी दिखती हैं।
* भारतीय ईसाइयों में भी *ब्राह्मण क्रिश्चियन* और *दलित क्रिश्चियन* जैसी विभाजनकारी रेखाएं बनी रहीं।
* **विवाह और रोटी-बेटी का संबंध (Endogamy):**
जाति या वर्ग व्यवस्था का सबसे मजबूत आधार अपनी ही जाति/समूह में विवाह करना रहा है। जब तक समाज में अंतर-जातीय और अंतर-वर्गीय विवाह आम नहीं हुए, तब तक यह संरचना टूटी नहीं।
* **आर्थिक और राजनीतिक हित:**
सत्ता, संसाधनों और भूमि पर नियंत्रण रखने वाले प्रभावशाली वर्गों ने हमेशा ऐसे ढाँचों को बनाए रखने का प्रयास किया जो उनकी श्रेष्ठता और संसाधनों पर कब्जे को बनाए रख सकें।
* **वैश्विक संदर्भ (अन्य धर्मों में वर्ग व्यवस्था):**
केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में जहाँ जाति-प्रथा (Caste System) नहीं थी, वहाँ **वर्ग व्यवस्था (Class System)** और **नस्लवाद (Racism)** हावी रहा। उदाहरण के लिए, अमेरिका और यूरोप में गोरे और काले का भेद (रंगभेद) या मध्यकाल में सामंतवादी (Feudal) ऊँच-नीच।
### निष्कर्ष
धर्मों के मूल सिद्धांतों (Philosophy) में समानता का उपदेश तो दिया गया, लेकिन व्यावहारिक समाजशास्त्र (Sociology) में इंसानी स्वार्थ, संसाधनों का बंटवारा और पारंपरिक सोच धर्म के सिद्धांतों पर हावी हो गई। यही कारण है कि कानून, आधुनिक शिक्षा और नए धर्मों के आने के बावजूद पूरी दुनिया में किसी न किसी रूप में सामाजिक पदानुक्रम आज भी मौजूद है।
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