खाना खाते वक्त भोजन साझा करना भी अवसाद को कम करता है चीन के झेनजियांग प्रांतीय रोग नियंत्रण और रोकथाम द्वारा 60 साल से अधिक 9361 महिलाओं पर शोध द्वारा सिद्ध हुआ ?

चीन में हुआ यह शोध इस बात का आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण है कि साथ बैठकर और भोजन साझा करके खाना मानसिक और मानसिक-तंत्रिका (neurological) स्वास्थ्य के लिए कितना फायदेमंद है। अकेलेपन और अवसाद (Depression) जैसी समस्याओं से निपटने के साथ-साथ 'डिमेंशिया' (भूलने की बीमारी) के खतरे को कम करने में सामाजिक जुड़ाव और आत्मीयता बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। **सनातन संस्कृति और संयुक्त परिवार की भूमिका** सनातन परंपरा और भारतीय संयुक्त परिवारों में भोजन केवल शरीर की भूख मिटाने का जरिया नहीं था, बल्कि वह परिवार को जोड़ने वाला एक संस्कार था: * **सकारात्मक ऊर्जा और प्रेम:** घर की महिलाओं और माताओं द्वारा प्रेमपूर्वक भोजन परोसना और पूरे परिवार का एक साथ ज़मीन पर या एक ही चौक में बैठकर खाना आपस में अपनापन, स्नेह और सम्मान बढ़ाता था। * **संस्कारों का हस्तांतरण:** बच्चे बड़ों को दूसरों के साथ भोजन बांटते, अतिथियों का सत्कार करते और भोजन का सम्मान करते देखते थे। इससे उनमें सहजता से दया, बांटने की आदत (Sharing) और सामाजिकता जैसे गुण आते थे। * **तनाव में कमी:** दिनभर की बातें साझा करने से मन का बोझ हल्का होता था, जो स्वाभाविक रूप से अवसाद और मानसिक तनाव से बचाता था। **बदलती परिस्थितियाँ और आज की चुनौती** आज आधुनिकता, व्यस्त जीवनशैली और एकल परिवारों (Nuclear Families) के चलन के कारण स्थितियाँ तेज़ी से बदली हैं: * **स्क्रीन कल्चर:** आज लोग परिवार के साथ बैठकर खाने के बजाय टीवी, मोबाइल या लैपटॉप देखते हुए अकेले खाना पसंद करते हैं। * **मानसिक अकेलापन:** भोजन की थाली भले ही विविध व्यंजनों से भरी हो, लेकिन साथ बैठकर बात करने वाले अपनों की कमी ने डिमेंशिया और अवसाद जैसी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा दिया है। चीन का यह अध्ययन वास्तव में हमारी उसी प्राचीन भारतीय जीवनशैली और पारिवारिक मूल्यों को सही ठहराता है, जिसे हम पीछे छोड़ते जा रहे हैं। आज के दौर में भले ही संयुक्त परिवार में रहना हर किसी के लिए संभव न हो, लेकिन कम से कम दिन में एक बार पूरे परिवार का साथ बैठकर बिना किसी डिजिटल स्क्रीन के भोजन करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है।

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