**पर्सोपोलिस (Persepolis)** में राजा **डेरियस प्रथम (Darius I)** के अपदाना महल की नींव से मिली **सोने की पट्टिका (Gold Foundation Tablet)** का है, जिस पर प्राचीन कीलाक्षर लिपि (Cuneiform script) में उत्कीर्ण शिलालेख (DPh inscription) दर्ज है।
इस पट्टिका पर लिखे मुख्य प्राचीन फ़ारसी संदेश का हिंदी अनुवाद निम्नलिखित है:
> **"मैं महान राजा डेरियस हूँ, राजाओं का राजा, देशों का राजा, हिस्टास्पेस (Hystaspes) का पुत्र, एक हखामनी (Achaemenid)।**
> **राजा डेरियस कहते हैं: यह वह साम्राज्य है जिस पर मेरा अधिकार है, सोग्डिया (Sogdia) के पार रहने वाले शक (Sacae) से लेकर कुश (Kush/इथियोपिया) तक, और सिंध (Sind/भारत) से लेकर लिडिया (Lydia) तक — जिसे देवताओं में सबसे महान, अहुरा मज़्दा (Ahuramazda) ने मुझे प्रदान किया है।**
> **अहुरा मज़्दा मेरी और मेरे राजपरिवार की रक्षा करें!"**
इस सोने की पट्टिका (DPh inscription) का भारतीय इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यह **भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों और प्राचीन ईरान (हखामनी साम्राज्य/Achaemenid Empire) के ऐतिहासिक संबंधों का पहला लिखित और प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण** प्रस्तुत करती है।
भारतीय इतिहास के दृष्टिकोण से यह निम्नलिखित बातें दर्शाता है:
1. **भारत (सिंध/हिन्दू) का उल्लेख:**
इस शिलालेख में राजा डेरियस (दारा प्रथम) ने अपने साम्राज्य की सीमाओं का वर्णन करते हुए **"हेंदु" (Hinduš - सिंधु नदी के आसपास का क्षेत्र)** का स्पष्ट नाम लिया है। यह इतिहास के उन सबसे प्राचीन अभिलेखों में से एक है जहाँ भारत या उसके किसी क्षेत्र का नाम विदेशी आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज किया गया।
2. **उत्तर-पश्चिम भारत पर हखामनी शासन:**
यह पट्टिका (लगभग 518-515 ईसा पूर्व) यह सिद्ध करती है कि राजा डेरियस प्रथम ने सिंधु नदी के घाटी क्षेत्र (आधुनिक पंजाब और सिंध) को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया था। यह भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से पर पहला ज्ञात विदेशी आक्रमण और आधिपत्य था।
3. **मौर्य साम्राज्य (विशेषकर सम्राट अशोक) पर प्रभाव:**
* **अभिलेख लिखने की परंपरा:** राजा डेरियस की इस शिलालेख परंपरा (पत्थरों और पट्टिकाओं पर राजाज्ञा उत्कीर्ण कराने) ने बाद में भारत के मौर्य सम्राट अशोक को गहराई से प्रभावित किया। अशोक ने अपने महान शिलालेखों की प्रेरणा यहीं से ली थी।
* **खरोष्ठी लिपि का विकास:** फ़ारसी साम्राज्य के शासनकाल में वहाँ की प्रशासनिक भाषा 'अरामी' (Aramaic) का प्रयोग भारत के उत्तर-पश्चिम में होने लगा। इसी से आगे चलकर भारत में **खरोष्ठी लिपि** का जन्म हुआ, जिसका प्रयोग अशोक के गांधार/शाहबाज़गढ़ी अभिलेखों में मिलता है।
4. **व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध:**
इस साम्राज्य का हिस्सा बनने से भारत का व्यापार मध्य पूर्व, मिस्र और भूमध्य सागर के क्षेत्रों से सीधे जुड़ गया। भारतीय सैनिक, व्यापारी और विद्वान फ़ारसी साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में जाने लगे।
संक्षेप में, यह पट्टिका इस बात का ऐतिहासिक साक्ष्य है कि प्राचीन भारत केवल अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी में ही दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यों के साथ आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ा हुआ था।
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