उत्तराखंड राज्य में संस्थागत प्रसव का आंकड़ा 88.90% तक पहुंचा ?

हाल ही में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड ने संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) के मामले में शानदार प्रगति की है और यह आंकड़ा **83.2% से बढ़कर 88.90%** तक पहुंच गया है। सरकार के प्रयासों से होम डिलीवरी (घर पर प्रसव) में भी 91% तक की भारी कमी आई है। लेकिन इस सकारात्मक पहलू के पीछे एक बड़ी और चिंताजनक चुनौती छिपी हुई है, जिस पर आपने बिल्कुल सटीक ध्यान आकर्षित किया है। ### विरोधाभास: आंकड़े बढ़े, लेकिन बुनियादी ढांचा अभी भी कमजोर * **जटिल मामलों में सरकारी तंत्र फेल:** भले ही 88.90% महिलाएं प्रसव के लिए अस्पतालों का रुख कर रही हैं, लेकिन जब बात **जटिल सिजेरियन (C-section) ऑपरेशनों** की आती है, तो पर्वतीय और दूरदराज के क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में हाथ खड़े हो जाते हैं। * **'रेफरल सेंटर' बने पहाड़ी अस्पताल:** डॉक्टरों और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की कमी के कारण गर्भवती महिलाओं को जरा सी भी जटिलता होने पर सीधे मैदानी इलाकों के बड़े अस्पतालों (जैसे सुशीला तिवारी अस्पताल, हल्द्वानी या दून अस्पताल, देहरादून) के लिए रेफर कर दिया जाता है। ### निजी अस्पताल क्यों बन रहे पहली पसंद? 1. **विशेषज्ञ डॉक्टरों (Gynecologists & Anesthetists) की भारी कमी:** उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों के जिला और उप-जिला अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों और एनेस्थीसियोलॉजिस्ट (निश्चेतक) के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। डॉक्टर न होने से ऑपरेशन संभव ही नहीं हो पाते। 2. **24x7 आपातकालीन सुविधाओं का अभाव:** सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर रात के समय या आपातकालीन स्थिति में सिजेरियन ऑपरेशन की सुविधा न के बराबर मिलती है। 3. **मजबूरी में भारी खर्च:** जब किसी परिवार को लगता है कि सरकारी अस्पताल में जच्चा-बच्चा की जान को खतरा हो सकता है या उन्हें अंतिम समय पर रेफर कर दिया जाएगा, तो वे कर्ज लेकर या अपनी जमा-पूंजी लगाकर **निजी अस्पतालों** का रुख करते हैं। जहां कई बार जरूरत न होने पर भी व्यावसायिक लाभ के लिए सिजेरियन ऑपरेशन कर दिए जाते हैं। > **निष्कर्ष:** सरकार संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर महिलाओं को अस्पताल तक लाने में तो सफल रही है, लेकिन जब तक पहाड़ों के सरकारी अस्पतालों में **विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती, ब्लड बैंक और ऑपरेशन थिएटर** को सुदृढ़ नहीं किया जाएगा, तब तक "सुरक्षित मातृत्व" का सपना पूरी तरह सच नहीं हो पाएगा और गरीब परिवारों की पहली पसंद मजबूरी में निजी अस्पताल ही बने रहेंगे। > इस विषय को गहराई से समझने और सिजेरियन प्रसव से जुड़े अन्य पहलुओं को जानने के लिए, आप सिजेरियन डिलीवरी पर यह विशेष रिपोर्ट देख सकते हैं, जो देश में बढ़ते सिजेरियन ऑपरेशनों और स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करती है।

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