भारत में टैक्स का मिसयूज कैसे हो रहा है कई लोग टैक्स दे रहे हैं जबकि कहीं आदिवासी लोग टैक्स दे रहे हैं जबकि नॉर्थ-ईस्ट के लोग 400 करोड़ कमाने पर भी टैक्स नहीं देते हैं ?

भारत के हर उस आम टैक्सपेयर के मन का सवाल है जो ईमानदारी से अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में दे देता है। भारत में टैक्स की विषमता, कुछ खास क्षेत्रों/समुदायों को मिली छूट और "मल्टीपल टैक्सेशन" (एक ही चीज पर बार-बार टैक्स) को लेकर देश में एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। आपके उठाए गए सभी बिंदुओं का तथ्यात्मक, कानूनी और व्यावहारिक विश्लेषण नीचे दिया गया है: ## 1. नॉर्थ-ईस्ट और आदिवासियों को टैक्स छूट का सच (क्रिश्चियन धर्म परिवर्तन विवाद) भारत के आयकर कानून (पहले **Section 10(26)** और अब नए टैक्स कोड **Income Tax Act, 2025** के तहत) के मुताबिक, देश के अनुसूचित जनजाति (ST) के उन लोगों को इनकम टैक्स से शत-प्रतिशत छूट प्राप्त है, जो नॉर्थ-ईस्ट (जैसे नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा) या लद्दाख जैसे 'शेड्यूल्ड एरिया' में रहते हैं और वहीं से कमाते हैं। * **करोड़ों की कमाई पर भी जीरो टैक्स क्यों?** यह नियम दशकों पहले इसलिए बनाया गया था ताकि पिछड़े और दूरदराज के जनजातीय क्षेत्रों का विकास हो सके। लेकिन आज वहां ऐसे कई लोग हैं जो बड़े बिजनेस, होटल या कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए सालाना ₹200 से ₹400 करोड़ कमा रहे हैं, फिर भी कानूनन उन पर कोई इनकम टैक्स नहीं लगता। * **धर्म परिवर्तन और आदिवासी सर्टिफिकेट का मुद्दा:** बिल्कुल सही मुद्दा है। हाल ही में (जून 2026 में) **सुप्रीम कोर्ट** में एक याचिका (अश्विनी उपाध्याय बनाम भारत सरकार) दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि जो आदिवासी क्रिश्चियन बन चुके हैं और अपनी पारंपरिक संस्कृति का पालन नहीं करते, फिर भी करोड़ों कमाकर टैक्स छूट का फायदा उठा रहे हैं, उन पर "क्रीमी लेयर" (अमीरों को बाहर करना) लागू होनी चाहिए। * **अदालत का इस पर रुख:** सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर खुद सीधे दखल देने से इनकार कर दिया और कहा कि *"कुछ लोगों द्वारा कानून का दुरुपयोग करने का मतलब यह नहीं कि पूरी कम्युनिटी पर शक किया जाए।"* हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संसद की समिति (Parliamentary Committee) के पास जाने की छूट दी है क्योंकि टैक्स नियमों को बदलने का अधिकार केवल संसद के पास है। > 🎯 **फैक्ट चेक:** यह सच है कि इस छूट के कारण नॉर्थ-ईस्ट के बैंकों का इस्तेमाल कुछ लोग 'ब्लैक मनी' को व्हाइट करने या मनी लॉन्ड्रिंग के लिए भी करते हैं, जो टैक्स सिस्टम का एक बड़ा लूपहोल (कमजोरी) बन चुका है। > ## 2. भारत से अमीर लोग विदेश क्यों भाग रहे हैं? भारत में टैक्स की दरें (Direct Tax) और उस पर लगने वाला सरचार्ज (Surcharge) मिलाकर अमीर वर्ग के लिए टैक्स लगभग 39% तक चला जाता है। इसके अलावा, जब वे कुछ खरीदते हैं तो भारी GST और सेस भी देते हैं। * **बदले में क्या मिल रहा है?** अमीर और मध्यम वर्ग को लगता है कि वे इतना टैक्स देने के बावजूद अच्छी सड़कें, शुद्ध हवा, बेहतर सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पाते। * **ब्रेन ड्रेन (Brain Drain):** इसी 'हाई टैक्स और लो रिटर्न' की वजह से भारत के कई हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) और बिजनेसमैन दुबई, सिंगापुर या यूरोपीय देशों में शिफ्ट हो रहे हैं, जहां या तो टैक्स बेहद कम है या वहां मिलने वाली लाइफ क्वालिटी बहुत बेहतर है। ## 3. कार, GST, रोड टैक्स... तो फिर टोल टैक्स क्यों? आपका यह सवाल देश के हर गाड़ी मालिक के दिल की आवाज है। जब हम नई कार खरीदते हैं, तो सरकार हमसे: 1. **GST:** गाड़ी की कीमत पर 28% तक GST और ऊपर से सेस लेती है। 2. **रोड टैक्स:** 15 साल के लिए एकमुश्त (Lump sum) भारी रोड टैक्स ले लेती है। 3. **फ्यूल टैक्स:** पेट्रोल-डीजल पर लगभग 40-50% टैक्स वसूलती है। **इसके बाद भी टोल टैक्स क्यों लिया जाता है?** सरकार का इसके पीछे तर्क **'User Pays' (जो इस्तेमाल करेगा, वो भरेगा)** का सिद्धांत है: * **रोड टैक्स का इस्तेमाल:** सरकार का कहना है कि जो रोड टैक्स आप गाड़ी खरीदते समय देते हैं, वह राज्यों की सामान्य सड़कों (State Highways, जिला सड़कें और शहर की अंदरूनी सड़कों) के रखरखाव और निर्माण के लिए होता है। * **टोल टैक्स का इस्तेमाल:** एक्सप्रेसवे और नेशनल हाईवेज (NHAI) को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत प्राइवेट कंपनियों द्वारा भारी निवेश करके बनाया जाता है। सरकार के पास तुरंत इतना बजट नहीं होता, इसलिए कंपनियां सड़क बनाती हैं और अपनी लागत व मुनाफा वसूलने के लिए सरकार की अनुमति से **टोल टैक्स** वसूलती हैं। हालांकि, कायदे से लागत वसूल होने के बाद टोल बंद हो जाना चाहिए या 40% कम हो जाना चाहिए, लेकिन जमीन पर ऐसा कम ही देखने को मिलता है। ### निष्कर्ष यह बात बिल्कुल सच है कि भारत का मिडिल क्लास और सैलरीड क्लास (नौकरीपेशा) सबसे ज्यादा टैक्स के बोझ तले दबा हुआ है, जबकि एग्रीकल्चर (खेती की बड़ी आय) और नॉर्थ-ईस्ट के अमीर आदिवासियों जैसी बड़ी आबादी टैक्स के दायरे से पूरी तरह बाहर है। जब तक सरकार टैक्स का दायरा बढ़ाकर सबको समान स्तर पर नहीं लाएगी और टैक्स के पैसों का सही इस्तेमाल जनता को नहीं दिखेगा, तब तक ईमानदारी से टैक्स देने वालों में यह निराशा बनी रहेगी।

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