क्या पाठ्यक्रमों में इंग्लिश हिंदी का भेद भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा किया जा रहा है ?
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यह एक विषय पर भारत में शिक्षा, भाषा और राष्ट्रीय पहचान के भविष्य को लेकर चल रही एक बड़ी बहस का केंद्र है।
इसे समझने के लिए हमें इसके अलग-अलग पहलुओं को देखना होगा :
## 1. सरकारी स्कूलों में इंग्लिश मीडियम और प्राइवेट स्कूलों से मुकाबला
यह बात बिल्कुल सच है कि कई राज्य सरकारें (जैसे दिल्ली, आंध्र प्रदेश, और राजस्थान में महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल) अब सरकारी स्कूलों में इंग्लिश मीडियम के विकल्प दे रही हैं।
* **मुकाबला (Competition):** इसका मुख्य उद्देश्य उन गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों को समान अवसर देना है जो प्राइवेट स्कूलों की भारी-भरकम फीस सिर्फ "अंग्रेजी" के चक्कर में भरते हैं। जब सरकारी स्कूलों में मुफ्त या कम फीस में एनसीईआरटी (NCERT) पाठ्यक्रम के साथ अंग्रेजी माध्यम मिलेगा, तो निश्चित रूप से प्राइवेट स्कूलों का एकाधिकार कम होगा।
* **बोर्ड का भ्रम:** यहाँ एक छोटा सा सुधार जरूरी है—**ICSE बोर्ड पूरी तरह से इंग्लिश मीडियम ही है।** वास्तव में, सरकारी स्कूल मुख्य रूप से **CBSE** (केंद्रीय बोर्ड) या अपने-अपने **स्टेट बोर्ड (State Boards)** से जुड़े होते हैं, जो हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं दोनों में चलते हैं।
## 2. क्या भाषा बदलने से राष्ट्रप्रेम और क्षेत्रीय भाषा से प्रेम कम हो जाएगा?
यह एक बहुत बड़ी चिंता है, लेकिन इसका समाधान हमारी **नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020)** में ढूंढने की कोशिश की गई है।
* **मातृभाषा को प्राथमिकता:** NEP 2020 साफ तौर पर कहती है कि कम से कम कक्षा 5 (और संभव हो तो कक्षा 8) तक की पढ़ाई मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में होनी चाहिए। वैज्ञानिक रिसर्च भी कहती है कि बच्चे अपनी शुरुआती भाषा में सबसे बेहतर सीखते हैं।
* **भाषा सिर्फ माध्यम है, संस्कार नहीं:** अंग्रेजी सीखना वैश्विक स्तर पर रोजगार और तकनीक (जैसे कंप्यूटर, कोडिंग, ग्लोबल बिजनेस) के लिए एक **'टूल' (साधन)** की तरह है। एक युवा अंग्रेजी बोलकर भी उतना ही बड़ा देशभक्त हो सकता है, जितना हिंदी या अपनी क्षेत्रीय भाषा बोलने वाला।
* **चिंता कहाँ है?** खतरा तब होता है जब हम अंग्रेजी जानने वाले को 'श्रेष्ठ' और अपनी भाषा बोलने वाले को 'कमतर' समझने लगते हैं। अगर हम अपनी बोलियों, लोक-साहित्य और इतिहास को पाठ्यक्रम में मजबूत रखेंगे, तो युवाओं का अपनी मिट्टी से जुड़ाव कभी कम नहीं होगा।
## 3. क्या भारत आत्मनिर्भर, सुरक्षित और समृद्ध बनेगा?
भाषा और आत्मनिर्भरता का बहुत सीधा संबंध है:
* **समृद्धि और वैश्विक बाजार:** आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हमारे युवाओं के पास अगर **अपनी संस्कृति की समझ (Roots)** और **वैश्विक भाषा (English)** दोनों का कॉम्बिनेशन होगा, तो वे दुनिया के किसी भी कोने में जाकर भारत का परचम लहरा सकते हैं।
* **आत्मनिर्भरता:** जब एक गरीब परिवार का बच्चा अंग्रेजी और आधुनिक तकनीक सीखकर बड़ा वैज्ञानिक, इंजीनियर या उद्यमी बनेगा, तभी देश असली मायने में आत्मनिर्भर बनेगा।
> **निष्कर्ष:** सरकार का मकसद हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं को खत्म करना नहीं, बल्कि अंग्रेजी के नाम पर होने वाले भेदभाव को मिटाना है। यदि युवा वर्ग अंग्रेजी को सिर्फ एक 'हुनर' (Skill) की तरह सीखे और अपनी मातृभाषा को अपना 'गौरव' (Pride) बनाए रखे, तो भारत निश्चित रूप से सुरक्षित, समृद्ध और अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ रहेगा।
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इस विषय पर आपके क्या विचार हैं? क्या आपको लगता है कि स्थानीय स्तर पर हमारी बोलियों को बचाने के लिए स्कूलों में कुछ अलग से प्रयास होने चाहिए?
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