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इस ऐतिहासिक स्थल को इतिहास और पुरातत्व में **"भंभोर की मस्जिद" (Banbhore Mosque)** या **"देवल (देबल) मस्जिद"** के नाम से जाना जाता है।
अविभाजित भारत (उपमहाद्वीप) के इतिहास में यह **सबसे प्राचीन मस्जिदों** में से एक मानी जाती है।
यह मस्जिद और प्राचीन देवल बंदरगाह पाकिस्तान के **सिंध प्रांत (कराची से लगभग 64 किमी दूर, ठट्टा जिले में)** में स्थित है।
### देवल मस्जिद का इतिहास और महत्वपूर्ण तथ्य
#### 1. मुहम्मद बिन क़ासिम का आक्रमण (711-712 ईस्वी)
8वीं शताब्दी की शुरुआत (712 ई.) में अरब सेनापति **मुहम्मद बिन क़ासिम** ने सिंध के तत्कालीन राजा **दाहिर** को हराकर 'देवल' (देबल) बंदरगाह पर कब्ज़ा किया था। देवल पर जीत के बाद ही इस क्षेत्र में पहली बार इस्लामी शासन स्थापित हुआ और इबादत के लिए यहाँ मस्जिद का निर्माण कराया गया।
#### 2. लगभग 1300 साल पुरानी इमारत (727 ईस्वी का शिलालेख)
1958 में जब पाकिस्तान के पुरातत्व विभाग ने भंभोर की खुदाई शुरू की, तो यहाँ से एक वर्ग आकार की मस्जिद के अवशेष मिले। खुदाई में कुफिक (Kufic) लिपि में लिखा एक अरबी शिलालेख मिला, जिससे पता चला कि यह मस्जिद **727 ईस्वी (109 हिजरी)** में बनी या पुनर्निर्मित की गई थी—यानी आज से लगभग 1,300 साल पहले।
#### 3. 'देवल' से 'भंभोर' नाम क्यों पड़ा?
* 'देवल' (Dewal) शब्द **'देवालिया' (मंदिर/Deval) से आया था**, क्योंकि यहाँ एक बड़ा और प्रसिद्ध मंदिर हुआ करता था।
* 13वीं शताब्दी के आसपास सिंधु नदी के मार्ग बदलने और तटीय इलाकों के सूखने के कारण यह बंदरगाह उजड़ गया। बाद में इस ऐतिहासिक खंडहर और क्षेत्र को **'भंभोर'** के नाम से जाना जाने लगा।
#### 4. वास्तुकला की अनोखी विशेषताएं
* **मेहराब का न होना:** इस मस्जिद की सबसे खास बात यह थी कि इसकी पश्चिमी दीवार में पारंपरिक **'मेहराब' (Mihrab)** नहीं था। शुरुआती दौर की शुरुआती मस्जिदों में मेहराब बनाने की परंपरा शुरू नहीं हुई थी, जो यह साबित करता है कि यह बेहद प्राचीन है।
* **लकड़ी और पत्थर का प्रयोग:** मस्जिद के प्रार्थना कक्ष की छत लकड़ी के 33 स्तंभों (Pillars) पर टिकी थी, जिनके बलुआ पत्थर के आधार खुदाई में मिले हैं।
* **बनावट:** इसमें 75×58 फीट का एक विशाल खुला आंगन था और चारों तरफ चूना पत्थर (Limestone) की मोटी दीवारें थीं।
**'देबल की घेराबंदी' (Siege of Debal)** ;
सन **712 ईस्वी** में अरब सेनापति **मुहम्मद बिन क़ासिम** और सिंध के राजा दाहिर की सेना के बीच हुआ युद्ध इतिहास में **'देबल की घेराबंदी' (Siege of Debal)** के नाम से जाना जाता है। इस ऐतिहासिक मंदिर और देबल बंदरगाह को जीतने के पीछे सैन्य रणनीति, आधुनिक युद्ध उपकरण और आंतरिक भेदों की अहम भूमिका थी।
ऐतिहासिक ग्रंथों (जैसे *चचनामा*) के अनुसार, इस जीत की मुख्य प्रक्रिया इस प्रकार थी:
### 1. आधुनिक प्रक्षेपास्त्रों (Manjanik / Catapult) का उपयोग
अरब सेना अपने साथ **'मंजनीक' (Manjanik)** नामक भारी पत्थर और तोप जैसे गोले फेंकने वाले विशाल प्रक्षेपास्त्र (Catapults) लाई थी।
* इनमें से सबसे प्रमुख मंजनीक का नाम **'अल-अरोस' (Al-Aros)** था।
* इसका उपयोग करके देबल के मजबूत किले की दीवारों और मंदिर के ऊँचे परकोटों पर भारी पत्थरों की बारिश की गई।
### 2. विशाल ध्वज और गुंबद का गिराया जाना
ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, देबल के विशाल मंदिर के शिखर पर एक बहुत बड़ा **लाल ध्वज (पताका)** फहराता था।
* स्थानीय निवासियों और रक्षकों में यह धारणा थी कि जब तक वह ध्वज मंदिर पर फहरा रहा है, तब तक नगर और मंदिर को कोई क्षति नहीं पहुँच सकती।
* मुहम्मद बिन क़ासिम ने अपने निशानेबाजों को विशेष रूप से उस ध्वज और उसके खंभे को निशाना बनाने का आदेश दिया।
* जब 'अल-अरोस' मंजनीक से फेंके गए पत्थरों से मंदिर का वह पवित्र ध्वज गिर गया, तो दुर्ग के रक्षकों और सैनिकों में मानसिक रूप से भारी निराशा और भगदड़ मच गई।
### 3. किले की दीवारों को लांघना और हमला
ध्वज गिरने से पैदा हुई अफरा-तफरी का फायदा उठाकर अरब सैनिकों ने सीढ़ियों के सहारे देबल किले की मजबूत दीवारों को लांघ लिया।
* राजा दाहिर के भतीजे, जो देबल के गवर्नर थे, उन्होंने अपनी सेना (जिसमें राजपूत और स्थानीय रक्षक शामिल थे) के साथ मुकाबला किया, लेकिन किले की प्राचीर टूटने के बाद वे टिक न सके।
### 4. कब्जे के बाद का घटनाक्रम
किले और मंदिर पर नियंत्रण हासिल करने के बाद नगर पर अधिकार कर लिया गया। इसी मंदिर के परिसर/स्थान का उपयोग करते हुए वहाँ **देवल (भंभोर) की पहली मस्जिद** का निर्माण कराया गया, जिसके अवशेष आज भी पुरातात्विक खुदाई में देखने को मिलते हैं।
इस प्रकार, देबल पर जीत तकनीकी युद्ध-कौशल (मंजनीक का उपयोग) और रक्षकों के मनोबल के टूटने का परिणाम थी।
### ऐतिहासिक महत्व
अविभाजित भारत (जो आज भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में विभाजित है) में शुरुआती इस्लामी वास्तुकला को समझने के लिए यह मस्जिद एक अहम साक्ष्य है। यद्यपि केरल की **चेरामन जुमा मस्जिद** को भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापारी संबंधों के आधार पर बनी सबसे पुरानी मस्जिद माना जाता है, लेकिन पुरातात्विक खुदाई में प्रमाणित अवशेषों के हिसाब से सिंध की यह **देवल/भंभोर मस्जिद** दक्षिण एशिया की सबसे पुरानी मस्जिदों में प्रमुख स्थान रखती है।
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