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हाल ही में जारी स्वास्थ्य मंत्रालय की **राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6)** की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रगति की है। राष्ट्रीय स्तर पर **संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) का आंकड़ा बढ़कर 90.6%** हो गया है, जो पिछली रिपोर्ट (NFHS-5) में 88.6% था।
यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि भारत अब 'यूनिवर्सल कवरेज' (हर महिला तक अस्पताल की पहुंच) के बेहद करीब है। लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों में स्थिति एक जैसी नहीं है।
### 1. शानदार प्रदर्शन करने वाले राज्य (जिन्हें सबसे ज्यादा फायदा हुआ)
इन राज्यों में बुनियादी ढांचे में सुधार, जागरूकता और सरकारी योजनाओं (जैसे जननी सुरक्षा योजना) के बेहतरीन क्रियान्वयन से संस्थागत प्रसव लगभग 100% के करीब पहुंच गया है:
* **तमिलनाडु और केरल:** तमिलनाडु में यह आंकड़ा **99.7%** तक पहुंच चुका है, वहीं केरल, गोवा और तेलंगाना भी **98%-99%** के साथ शीर्ष पर बने हुए हैं। तमिलनाडु सरकार तो अब शत-प्रतिशत का लक्ष्य हासिल करने के लिए बिना डॉक्टरी देखरेख के होने वाली होम डिलीवरी को पूरी तरह प्रतिबंधित करने पर विचार कर रही है।
* **उत्तराखंड और हिमाचल:** पहाड़ी और विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद उत्तराखंड ने शानदार प्रदर्शन करते हुए **88.90%** का आंकड़ा छुआ है।
* **उत्तर प्रदेश और बिहार:** आबादी के लिहाज से बेहद बड़े इन दोनों राज्यों ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी स्थिति में सबसे बड़ा और क्रांतिकारी सुधार दर्ज किया है, जिससे राष्ट्रीय औसत को 90.6% तक पहुंचने में मदद मिली।
### 2. जिन राज्यों/क्षेत्रों में स्थिति अभी भी चिंताजनक है
भले ही पूरे देश में औसत सुधरा है, लेकिन कुछ राज्यों के सुदूर इलाकों में आज भी स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं:
* **पूर्वोत्तर के राज्य (विशेषकर मेघालय और नागालैंड):** दुर्गम पहाड़ियों, कनेक्टिविटी की कमी और कुछ पारंपरिक/सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण नागालैंड और मेघालय जैसे राज्यों में संस्थागत प्रसव की दर राष्ट्रीय औसत (90.6%) से काफी नीचे बनी हुई है। यहां आज भी बहुत सी प्रसव प्रक्रियाएं घरों में ही होती हैं।
* **झारखंड और छत्तीसगढ़ के सुदूर आदिवासी अंचल:** हालांकि इन राज्यों के शहरी और मुख्य ग्रामीण इलाकों में सुधार हुआ है, लेकिन आंतरिक और नक्सल प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों में एम्बुलेंस और अस्पतालों की अनुपलब्धता के कारण स्थिति अभी भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है।
### 3. NFHS-6 के आंकड़े देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के बारे में क्या दर्शाते हैं?
NFHS-6 की यह रिपोर्ट भारतीय स्वास्थ्य तंत्र की **दो बड़ी सच्चाइयों (सफलता और नई चुनौतियां)** को उजागर करती है:
* **सफलता (अस्पताल तक पहुंच बढ़ी):** अब 10 में से 9 बच्चों का जन्म अस्पतालों में सुरक्षित माहौल में हो रहा है। इसके साथ ही पहली तिमाही (First Trimester) में ही गर्भावस्था की जांच (ANC) कराने वाली महिलाओं की संख्या 70% से बढ़कर **76.2%** हो गई है। बच्चों का पूर्ण टीकाकरण भी 87.1% तक पहुंच गया है।
* **नई चुनौती (सिजेरियन डिलीवरी का संकट - C-Section Crisis):** अस्पतालों में प्रसव बढ़ने का एक स्याह पहलू भी सामने आया है। देश में सिजेरियन ऑपरेशन का ग्राफ अप्रत्याशित रूप से **21.5% से बढ़कर 27.2%** हो गया है।
* **निजी अस्पतालों का खेल:** सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि **निजी अस्पतालों में होने वाले प्रसवों में से 54.1% (आधे से अधिक) ऑपरेशन सिजेरियन हो रहे हैं**, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह आंकड़ा सिर्फ 16.9% है। शहरी क्षेत्रों में तो कुल सिजेरियन डिलीवरी 40.5% तक पहुंच गई है।
> **निष्कर्ष:** NFHS-6 साफ दिखाता है कि भारत "जच्चा-बच्चा को जीवित बचाने" की पहली लड़ाई तो काफी हद तक जीत चुका है, क्योंकि घरों में होने वाले असुरक्षित प्रसव बंद हो रहे हैं। लेकिन अब दूसरी बड़ी लड़ाई **"क्वालिटी केयर और मेडिकल एथिक्स"** की है, ताकि निजी अस्पतालों द्वारा व्यावसायिक फायदे के लिए किए जा रहे अनावश्यक सिजेरियन ऑपरेशनों को रोका जा सके और सरकारी अस्पतालों में जटिल ऑपरेशनों की सुविधाएं बढ़ाई जा सकें।
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