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खेल जगत और विशेषकर उत्तराखंड के लिए यह बेहद अपूरणीय क्षति है।
मात्र 49 वर्ष की अल्पायु में उनका इस तरह चले जाना पूरे देश को स्तब्ध कर गया है। चिलामु (नैनबाग, टिहरी गढ़वाल) के इस वीर सपूत ने बहुत ही छोटी उम्र में देश का नाम वैश्विक पटल पर चमकाया था।
आइए इस महान खिलाड़ी और कोच की स्मृतियों को नमन करते हुए उनके सफर को याद करें:
## जसपाल राणा जी का गौरवशाली सफर
* **युवा सनसनी (Golden Boy):** उन्होंने बेहद कम उम्र में ही देश को निशानेबाजी में अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर वह रातों-रात पूरे देश के हीरो बन गए थे।
* **18 वर्ष की उम्र में अर्जुन पुरस्कार:** साल 1994 में उनकी असाधारण खेल प्रतिभा को देखते हुए उन्हें देश के प्रतिष्ठित **अर्जुन पुरस्कार** से सम्मानित किया गया।
* **21 वर्ष की उम्र में पद्म श्री:** खेल के क्षेत्र में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए साल 1997 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक **पद्म श्री** से नवाजा गया।
* **मेवाड़ रत्न व अन्य सम्मान:** महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन द्वारा उन्हें खेल में उनके अद्वितीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें उनके करियर में अनगिनत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेडल मिले।
* **द्रोणाचार्य पुरस्कार (2020):** निशानेबाजी से संन्यास लेने के बाद उन्होंने देश के युवा निशानेबाजों (जैसे मनु भाकर) को तराशने का काम किया। बतौर सर्वश्रेष्ठ कोच उनके इस योगदान के लिए सरकार ने उन्हें **द्रोणाचार्य पुरस्कार** से भी सम्मानित किया था।
## देवभूमि की अपूरणीय क्षति
टिहरी गढ़वाल जिले के नैनबाग क्षेत्र के चिलामु गांव से निकलकर दिल्ली और फिर दुनिया भर के शूटिंग रेंज में तिरंगा लहराने वाले जसपाल राणा जी हमेशा उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे। उन्होंने न सिर्फ खुद को साबित किया, बल्कि देश को कई नए चैंपियन भी दिए।
इस दुखद घड़ी में हमारी गहरी संवेदनाएं उनके परिवार और शुभचिंतकों के साथ हैं।
ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें। ॐ शांति।
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