न्यायाधीशों को सर्व विदित वेदों और शास्त्रों का ज्ञान होना चाहिए अधिवक्ता हरिशंकर जैन ?
अधिवक्ता हरिशंकर जैन (जो ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि जैसे कई हाई-प्रोफाइल मामलों में हिंदू पक्ष के प्रमुख वकील रहे हैं) द्वारा उठाई गई यह बहस भारत की न्याय व्यवस्था, संस्कृति और संवैधानिक भविष्य से जुड़ी एक बेहद गंभीर और दूरगामी चर्चा को जन्म देती है।
उनकी इस बात को और भारत को 'हिंदू राष्ट्र' बनाने की बहस को दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है, जो आज देश के कानूनी और सामाजिक गलियारों में चर्चा का विषय हैं:
### 1. न्यायाधीशों को वेदों और शास्त्रों का ज्ञान क्यों होना चाहिए?
हरिशंकर जैन और उनके वैचारिक समर्थक इसके पीछे यह तर्क देते हैं:
* **भारतीय न्यायशास्त्र (Indian Jurisprudence):** भारत की अपनी एक प्राचीन न्याय व्यवस्था रही है, जिसे 'धर्मशास्त्र' या 'नीतिशास्त्र' कहा जाता है। समर्थकों का मानना है कि केवल ब्रिटिश काल के कानूनों (मैकाले की दंड संहिता) पर निर्भर रहने के बजाय भारतीय जजों को भारत की मूल संस्कृति, परंपराओं और प्राचीन ग्रंथों का ज्ञान होना चाहिए ताकि वे भारत की आत्मा को समझकर न्याय कर सकें।
* **सांस्कृतिक समझ:** कई मामलों में (जैसे मंदिर प्रबंधन, धार्मिक रीति-रिवाज, और आस्था से जुड़े विवाद) शास्त्रों का सही ज्ञान न होने से कोर्ट कभी-कभी ऐसे फैसले दे देता है जो स्थानीय परंपराओं के विपरीत होते हैं।
### 2. 'हिंदू राष्ट्र' की बहस और संवैधानिक स्थिति
जहां तक भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने या बनाने की मांग का सवाल है, इस पर दो बिल्कुल विपरीत विचार हैं:
* **हिंदू राष्ट्र के समर्थकों का तर्क:**
इस विचार के लोगों का मानना है कि 'हिंदू' कोई केवल संकुचित धार्मिक पहचान नहीं है, बल्कि यह इस उपमहाद्वीप की एक जीवन पद्धति (Way of Life) और संस्कृति है। उनके अनुसार, भारत की सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए और विभाजन के समय जो ऐतिहासिक भूलें हुईं, उन्हें सुधारा जाना चाहिए।
* **संविधान और कानूनविदों का तर्क:**
दूसरी तरफ, भारत के सर्वोच्च न्यायालय और देश के अधिकांश संविधान विशेषज्ञों का रुख इस पर बिल्कुल स्पष्ट है:
* **मूल ढांचा (Basic Structure):** सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक *केशवानंद भारती (1973)* और *एस. आर. बोम्मई (1994)* मामलों में यह साफ कर दिया है कि **'पंथनिरपेक्षता' (Secularism)** भारतीय संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। संसद भी संविधान के मूल ढांचे को बदल नहीं सकती।
* **विविधता की रक्षा:** कानूनविदों का मानना है कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है, जहां सभी धर्मों के नागरिकों को समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 और 25) प्राप्त है।
> **संतुलित दृष्टिकोण:** एक लोकतांत्रिक और बहुसांस्कृतिक देश में इस तरह के वैचारिक विमर्श चलते रहते हैं। जहां एक तरफ देश की प्राचीन न्याय प्रणाली और सांस्कृतिक मूल्यों को समझना न्यायपालिका के समृद्धिकरण के लिए अच्छा हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ आधुनिक लोकतंत्र में 'कानून के शासन' (Rule of Law) और संविधान की सर्वोच्चता ही देश को एक सूत्र में बांधे रखने का सबसे मजबूत आधार है।
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