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दुनिया में मार्शल आर्ट को चीन का कहती है जबकि वह भारतीय भिक्षु बोधिधर्म द्वारा चीन में फैलाई गई थी ?
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आज दुनिया इस बात को स्वीकार कर रही है। जिस **कुंग-फू (Kung Fu)** और मार्शल आर्ट्स को आज पूरी दुनिया चीन की बपौती मानती है, उसकी जड़ें असल में भारत में हैं और इसके जनक **बोधिधर्मन (Bodhidharma)** थे।
इस महान ऐतिहासिक यात्रा और भारत के योगदान को हम कुछ मुख्य बिंदुओं से समझ सकते हैं:
### 1. कौन थे बोधिधर्मन?
बोधिधर्मन का जन्म 5वीं-6वीं शताब्दी के दौरान दक्षिण भारत में **पल्लव राजवंश** के कांचीपुरम (तमिलनाडु) के एक राजा के घर में हुआ था। वह एक राजकुमार थे, लेकिन उन्होंने राजपाठ छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया। वह न केवल बौद्ध दर्शन के ज्ञाता थे, बल्कि प्राचीन भारतीय युद्ध कला **'कलारीपयट्टू' (Kalaripayattu)** और आयुर्वेद (मर्म विद्या) में भी निपुण थे।
### 2. भारत से चीन की यात्रा और शाओलिन मंदिर
अपने गुरु के आदेश पर बोधिधर्मन बौद्ध धर्म (विशेषकर 'ध्यान' या 'ज़ेन' बौद्ध धर्म) का प्रचार करने के लिए चीन के हेनान प्रांत पहुंचे। वहां उन्होंने **शाओलिन भिक्षुओं (Shaolin Monks)** को बहुत ही कमजोर और बीमार स्थिति में पाया। वे भिक्षु घंटों तक ध्यान तो लगाना चाहते थे, लेकिन शारीरिक रूप से इतने कमजोर थे कि ध्यान के दौरान सो जाते थे या बीमार पड़ जाते थे। साथ ही, जंगली जानवरों और डाकुओं से उनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं था।
### 3. 'कलारीपयट्टू' बना 'कुंग-फू'
भिक्षुओं की शारीरिक और मानसिक शक्ति को बढ़ाने के लिए बोधिधर्मन ने उन्हें प्राचीन भारतीय युद्ध कला **'कलारीपयट्टू'** के नियम, सांस लेने की तकनीक (प्राणायाम) और आत्मरक्षा के गुर सिखाए।
* बोधिधर्मन द्वारा सिखाए गए इन अभ्यासों को चीन में **'18 लोहान हाथ' (18 Luohan Hands)** कहा गया।
* यही भारतीय युद्ध कला समय के साथ विकसित होकर और चीनी संस्कृति में ढलकर **शाओलिन कुंग-फू** कहलाई।
### 4. चीन में पूजे जाते हैं 'दामो' (Damo)
चीन के लोग आज भी बोधिधर्मन को भूले नहीं हैं। चीनी भाषा में उन्हें **'दामो' (Da Mo)** कहा जाता है। शाओलिन मंदिर में आज भी उनकी विशाल मूर्तियां और तस्वीरें लगी हैं और उन्हें शाओलिन मार्शल आर्ट्स का सर्वोच्च गुरु (Primal Master) माना जाता है।
> **विडंबना और गर्व की बात:** यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस देश (भारत) ने दुनिया को आत्मरक्षा और फिटनेस की सबसे महान कला दी, वहां के लोग हॉलीवुड और चीनी फिल्मों को देखकर कुंग-फू के दीवाने होते हैं, जबकि इसके पीछे हमारे ही एक भारतीय भिक्षु का ज्ञान था। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी प्राचीन कलाओं जैसे 'कलारीपयट्टू' को पहचानें और बोधिधर्मन जैसे महापुरुषों के इतिहास को अपनी आने वाली पीढ़ियों को गर्व से बताएं।
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