आजादी के 78 साल बाद भी, जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और दिल्ली जैसे शहरों में पर्याप्त बिजली उत्पादन (Production) क्षमता है, तब भी आम नागरिकों को **निर्बाध (24x7 Uninterrupted) बिजली** के लिए तरसना पड़ता है।
गवर्नमेंट और प्राइवेट कंपनियों के होने के बावजूद इस क्षेत्र में खुला कॉम्पिटिशन क्यों नहीं है और भ्रष्टाचार की जड़ें कहां हैं, इसे कुछ कड़वे सच के साथ समझना होगा:
### 1. कॉम्पिटिशन क्यों नहीं है? (अधूरी 'प्राइवेटाइजेशन' और मोनोपॉली)
* **क्षेत्रों का बंटवारा (Monopoly):** भारत में टेलीकॉम सेक्टर (Jio, Airtel, Vi) की तरह बिजली में खुला कॉम्पिटिशन नहीं है। दिल्ली या मुंबई जैसे शहरों में अगर प्राइवेट कंपनियां (जैसे टाटा या बीएसईएस) हैं भी, तो उनका अपने-अपने इलाकों पर **एकाधिकार (Monopoly)** है। आप अपनी मर्जी से ऑपरेटर नहीं बदल सकते।
* **नेटवर्क पर सरकारी नियंत्रण:** बिजली के खंभे और तार बिछाने का बुनियादी ढांचा (Distribution Network) आज भी ज्यादातर राज्य सरकारों या चुनिंदा कंपनियों के पास ही है। कोई नई कंपनी आसानी से नए तार नहीं बिछा सकती क्योंकि इसमें भारी खर्च और सरकारी मंजूरियों की जरूरत होती है।
### 2. बिजली क्षेत्र में भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप
विद्युत क्षेत्र (Power Sector) में भ्रष्टाचार और सुस्ती के तीन मुख्य कारण हैं:
* **वोट बैंक और मुफ्त बिजली की राजनीति:** कई राज्यों में चुनाव जीतने के लिए मुफ्त बिजली की घोषणाएं तो कर दी जाती हैं, लेकिन सरकारें उन बिजली कंपनियों (DISCOMs) को समय पर सब्सिडी का पैसा नहीं चुकातीं। इससे कंपनियां भारी कर्ज में डूब जाती हैं और उनके पास बुनियादी ढांचे (नए ट्रांसफार्मर, आधुनिक तार) को सुधारने के लिए पैसे नहीं बचते।
* **बिजली चोरी (AT&C Losses):** सरकारी कंपनियों में राजनीतिक रसूख और अंदरूनी भ्रष्टाचार के कारण बड़े पैमाने पर बिजली चोरी को नजरअंदाज किया जाता है। ईमानदार उपभोक्ता जो बिल भरता है, उसे इस चोरी और भ्रष्टाचार की कीमत अघोषित बिजली कटौती और महंगे बिल के रूप में चुकानी पड़ती है।
* **ठेकेदारी और घटिया सामान:** ट्रांसफार्मर बदलने, नए तार बिछाने या मीटर लगाने के सरकारी ठेकों में भारी भ्रष्टाचार होता है, जिससे घटिया क्वालिटी का सामान इस्तेमाल होता है और हल्की सी बारिश या आंधी में भी ट्रिपिंग (बिजली गुल) हो जाती है।
### 3. समाधान क्या है? (बदलाव की शुरुआत)
इस गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार **विद्युत (संशोधन) विधेयक (Electricity Amendment Bill)** लेकर आई है। इस कानून के लागू होने से खेल पूरी तरह बदल जाएगा:
* **मोबाइल सिम की तरह बदलेगा बिजली का कनेक्शन:** इस कानून के तहत एक ही इलाके में कई सरकारी और प्राइवेट कंपनियों को बिजली बेचने की अनुमति होगी। वे एक ही इंफ्रास्ट्रक्चर (तारों) का इस्तेमाल करेंगी। अगर आपको टाटा की सर्विस पसंद नहीं है, तो आप सरकारी कंपनी या किसी अन्य प्राइवेट प्लेयर (जैसे अडानी) पर स्विच कर सकेंगे।
* **कॉम्पिटिशन से सुधरेगी सर्विस:** जब कंपनियों में ग्राहकों को लुभाने की होड़ मचेगी, तो वे मजबूरन निर्बाध बिजली देंगी, त्वरित कनेक्शन देंगी और भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।
> **निष्कर्ष:** समस्या बिजली के उत्पादन (Production) की नहीं है, बल्कि उसके वितरण (Distribution) और इच्छाशक्ति की है। जब तक बिजली क्षेत्र से राजनीतिक हस्तक्षेप खत्म नहीं होगा और उपभोक्ताओं को 'चॉइस' (विकल्प) नहीं मिलेगी, तब तक 78 साल क्या, आगे भी यह समस्या बनी रहेगी। कॉम्पिटिशन ही भ्रष्टाचार और तानाशाही का इकलौता इलाज है।
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यदि आप इस बात को और गहराई से समझना चाहते हैं कि कैसे सरकार कानून में बदलाव करके एक ही इलाके में कई बिजली कंपनियों को लाने की तैयारी कर रही है, तो आप इस विषय पर केंद्रित इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल पर चर्चा का वीडियो देख सकते हैं। यह वीडियो समझाता है कि कैसे आने वाले समय में बिजली क्षेत्र में मोनोपॉली खत्म होगी और उपभोक्ताओं को अपनी मर्जी की कंपनी चुनने का अधिकार मिलेगा।
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