विकसित देश सभी पहाड़ी देश होने के बावजूद शहरीकरण को स्वीकार करा, बोली भाषा संस्कृति का भी संरक्षण करा जबकि अन्य विकासशील देश शहरीकरण का 77 साल में सही तरीके से अपना ना करके दुष्परिणाम ज्यादा हुए समीक्षा?
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यह एक बहुत ही गहरा और विचारोत्तेजक अवलोकन है। यह सच है कि कई विकसित देशों (जैसे स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया या जापान) ने अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों (पहाड़ों) के बावजूद शहरीकरण और अपनी सांस्कृतिक पहचान के बीच एक शानदार संतुलन बनाया है।
इसके विपरीत, भारत जैसे विकासशील देशों में पिछले 77 वर्षों में शहरीकरण अक्सर 'अनियोजित विस्तार' (Unplanned Sprawl) बनकर रह गया है।
यहाँ इसकी विस्तृत समीक्षा दी गई है:
1. विकसित देशों की सफलता के मुख्य कारण
विकसित देशों ने शहरीकरण को अपनी संस्कृति पर हावी होने देने के बजाय उसे एक 'टूल' की तरह इस्तेमाल किया:
* विकेंद्रीकृत विकास (Decentralized Development): स्विट्जरलैंड जैसे देशों में छोटे कस्बों को ही इतना आधुनिक बनाया गया कि लोगों को बड़े शहरों की ओर भागना नहीं पड़ा। इससे उनकी स्थानीय बोलियां और पहाड़ी संस्कृति सुरक्षित रही।
* सख्त कानून और संरक्षण: इन देशों में ऐतिहासिक इमारतों और सांस्कृतिक स्थलों के आसपास निर्माण के बहुत कड़े नियम हैं। वे आधुनिक सुख-सुविधाएं तो अपनाते हैं, लेकिन घर के बाहरी ढांचे और भाषा को मौलिक रखते हैं।
* शिक्षा में मातृभाषा: जापान और जर्मनी जैसे देशों ने आधुनिक तकनीक को अपनी मातृभाषा में अपनाया। उन्होंने 'विकास' का मतलब 'अंग्रेजीकरण' नहीं समझा।
2. भारत (मैदानी राज्यों) में विफलता के कारण
भारत के मैदानी राज्यों (यूपी, बिहार, हरियाणा आदि) में शहरीकरण के दुष्परिणाम अधिक दिखने के पीछे कुछ प्रमुख कारण रहे हैं:
क. अनियोजित प्रवास (Distress Migration)
मैदानी राज्यों में लोग 'इच्छा' से नहीं बल्कि 'मजबूरी' (खेती में घाटा या रोजगार की कमी) में शहर भागते हैं। जब कोई व्यक्ति मजबूरी में पलायन करता है, तो वह अपनी संस्कृति को बोझ समझने लगता है और शहर की भीड़ में अपनी पहचान खो देता है।
ख. 'कॉस्मोपॉलिटन' बनने का दबाव
भारत में यह धारणा बन गई कि 'पढ़ा-लिखा और शहरी' होने का मतलब है अपनी बोली छोड़कर हिंदी या अंग्रेजी बोलना। इस हीन भावना (Inferiority Complex) ने भोजपुरी, मैथिली और हरियाणवी जैसी समृद्ध बोलियों को शहरों में 'गंवारू' घोषित कर दिया।
ग. बुनियादी ढांचे पर अत्यधिक बोझ
मैदानी इलाकों में जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है। 77 साल में हमने पुराने शहरों को ही फैलाया, नए 'स्मार्ट' शहर नहीं बसाए। परिणाम यह हुआ कि शहर "कंक्रीट के जंगल" बन गए जहाँ न तो सामुदायिक मेल-मिलाप के लिए जगह बची और न ही सांस्कृतिक उत्सवों के लिए।
3. तुलनात्मक समीक्षा: पहाड़ी देश बनाम भारतीय मैदान
| बिंदु | विकसित पहाड़ी देश | भारतीय मैदानी राज्य (विकासशील) |
|---|---|---|
| दृष्टिकोण | संस्कृति + आधुनिकता का समन्वय | आधुनिकता के लिए संस्कृति का त्याग |
| भाषा | मातृभाषा में उच्च शिक्षा और व्यापार | अंग्रेजी/हिंदी का प्रभुत्व, बोलियों का ह्रास |
| शहरीकरण | नियोजित और सीमित (Planned) | अनियंत्रित और अत्यधिक (Explosive) |
| पहचान | अपनी विरासत पर गर्व | पश्चिमी संस्कृति की नकल की होड़ |
4. आगे की राह: हम क्या सीख सकते हैं?
77 साल के अनुभव के बाद अब हमें 'आर अर्बन' (Rurban - Rural + Urban) मॉडल की जरूरत है:
* छोटे केंद्रों का विकास: जिला स्तर पर ही रोजगार और सुविधाएं पैदा करना ताकि महानगरों पर बोझ कम हो।
* सांस्कृतिक गौरव: स्थानीय बोलियों को स्कूली शिक्षा और डिजिटल कंटेंट (Films/YouTube) के माध्यम से सम्मान दिलाना।
* सार्वजनिक स्थानों का निर्माण: शहरों में ऐसे सामुदायिक केंद्र बनाना जहाँ लोक कला और भाषा का अभ्यास हो सके।
निष्कर्ष: विकसित देशों ने 'मशीन' को अपनाया लेकिन अपनी 'आत्मा' नहीं बेची। भारत को भी अब यह समझना होगा कि बिना अपनी भाषा और संस्कृति के, विकास केवल एक "खोकला ढांचा" मात्र है।
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