भारतीय संविधान में आदिवासी शब्द के जगह शेड्यूल ट्राइड शब्द क्यों जोड़ा गया क्यों औपनिवेशिक शब्दों के जगह आदिवासी शब्द संविधान में जोड़ने की मांग हो रही है ?

भारतीय संविधान में **'आदिवासी'** शब्द की जगह **'अनुसूचित जनजाति' (Scheduled Tribes - ST)** शब्द को शामिल करने और वर्तमान में पुनः 'आदिवासी' शब्द को संवैधानिक दर्जा देने की मांग के पीछे गहरे ऐतिहासिक, कानूनी और सामाजिक कारण हैं। आइए इसे दो मुख्य भागों में समझते हैं: ## 1. संविधान में 'शेड्यूल ट्राइब' (अनुसूचित जनजाति) शब्द क्यों जोड़ा गया? संविधान सभा में इस बात पर लंबी बहस हुई थी कि मूल निवासियों के लिए किस शब्द का प्रयोग किया जाए। 'आदिवासी' शब्द की जगह 'अनुसूचित जनजाति' को चुनने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण थे: * **संवैधानिक और कानूनी सटीकता (Legal Precision):** 'आदिवासी' (जिसका अर्थ है 'मूल निवासी') एक सांस्कृतिक और सामाजिक शब्द है। इसके विपरीत, 'अनुसूचित जनजाति' एक कानूनी और प्रशासनिक शब्द है। इसके तहत राष्ट्रपति द्वारा जारी एक **'अनुसूची' (Schedule)** में उन जातियों को सूचीबद्ध किया जाता है जिन्हें विशेष संरक्षण और आरक्षण की आवश्यकता होती है। * **समानता का सिद्धांत:** संविधान निर्माताओं (विशेषकर डॉ. बी.आर. आंबेडकर) का मानना था कि भारत के सभी नागरिक समान हैं। 'आदिवासी' शब्द का प्रयोग करने से यह संदेश जा सकता था कि देश में कुछ लोग 'मूल निवासी' हैं और बाकी लोग 'बाहरी' हैं, जिससे राष्ट्रीय एकता प्रभावित हो सकती थी। * **पहचान का राजनीतिकरण रोकने के लिए:** उस समय कुछ नेताओं का मानना था कि 'आदिवासी' शब्द का इस्तेमाल ब्रिटिश काल में फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया गया था, ताकि इस समुदाय को मुख्यधारा के समाज से अलग रखा जा सके। > **नोट:** संविधान सभा के सदस्य **जयपाल सिंह मुंडा** (जो खुद एक बड़े आदिवासी नेता थे) ने ज़ोर देकर कहा था कि संविधान में 'आदिवासी' शब्द का ही प्रयोग होना चाहिए, लेकिन अंततः कानूनी स्पष्टता के लिए 'अनुसूचित जनजाति' शब्द को ही स्वीकार किया गया। > ## 2. औपनिवेशिक शब्दों की जगह 'आदिवासी' शब्द जोड़ने की मांग क्यों हो रही है? वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों और आदिवासी संगठनों द्वारा 'अनुसूचित जनजाति' या औपनिवेशिक काल के पुराने वर्गीकरणों को हटाकर 'आदिवासी' शब्द को संवैधानिक मान्यता देने की मांग तेजी से उठ रही है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: ### क) 'मूल निवासी' होने का गौरव और पहचान (Identity & Pride) 'आदिवासी' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — **आदि (शुरुआत से) और वासी (रहने वाला)**। यह शब्द इस समुदाय को इस भूमि का 'मूल निवासी' घोषित करता है। जल, जंगल और जमीन पर उनके प्राकृतिक अधिकार को यह शब्द सीधे तौर पर दर्शाता है, जो 'शेड्यूल ट्राइब' जैसे प्रशासनिक शब्द से प्रकट नहीं होता। ### ख) औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति ब्रिटिश शासन के दौरान इस समुदाय के लिए 'एबोरिजिनल्स' (Aboriginals), 'प्रिमिटिव ट्राइब्स' (Primitive Tribes) या 'पिछड़े हिंदू' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जो एक हीन भावना पैदा करते थे। मांग करने वालों का तर्क है कि 'अनुसूचित जनजाति' भी उसी प्रशासनिक औपनिवेशिक व्यवस्था का विस्तार है, इसलिए इसे बदला जाना चाहिए। ### ग) अंतर्राष्ट्रीय पहचान (International Recognition) संयुक्त राष्ट्र (UN) और वैश्विक स्तर पर मूल निवासियों के लिए **'इंडिजिनस पीपल्स' (Indigenous Peoples)** शब्द का प्रयोग किया जाता है। भारत के संदर्भ में 'आदिवासी' शब्द पूरी तरह से 'इंडिजिनस' का पर्याय है। इस शब्द को संवैधानिक दर्जा मिलने से आदिवासियों को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और अधिकारों का बेहतर लाभ मिल सकेगा। ### घ) सांस्कृतिक और सामाजिक अस्मिता 'अनुसूचित जनजाति' केवल एक सरकारी सूची (List) है, जिसमें समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं। कई समुदायों का आरोप है कि राजनीतिक लाभ के लिए गैर-आदिवासियों को भी इस सूची में शामिल कर लिया जाता है। 'आदिवासी' शब्द उनकी अनूठी संस्कृति, प्रकृति-पूजा और जीवन शैली को एक विशिष्ट पहचान देता है जिसे किसी प्रशासनिक सूची में नहीं समेटा जा सकता। #### बताते चलें भारतीय आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी और संसद में उनके प्रतिनिधित्व के आंकड़े इस प्रकार हैं: ## 1. जनसंख्या में हिस्सेदारी और संख्या * **प्रतिशत:** भारत की कुल जनसंख्या में आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) लगभग **8.6%** हैं। * **संख्या:** आधिकारिक जनगणना (2011) के अनुसार देश में आदिवासियों की जनसंख्या लगभग **10.43 करोड़** (104.3 मिलियन) है। (वर्तमान अनुमानों के अनुसार यह संख्या 12 करोड़ से अधिक मानी जाती है)। ## 2. संसद (पार्लियामेंट) में आदिवासी सांसदों (MPs) की संख्या भारतीय संविधान के **अनुच्छेद 330** के तहत लोकसभा में आदिवासियों की जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की गई हैं: * **लोकसभा (Lower House):** लोकसभा की कुल 543 निर्वाचित सीटों में से **47 सीटें** अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित हैं। यानी लोकसभा में वर्तमान में **कम से कम 47 आदिवासी सांसद** मौजूद हैं। (कुछ सांसद सामान्य सीटों से भी जीतकर आ सकते हैं)। * **राज्यसभा (Upper House):** राज्यसभा में आरक्षण की कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं है, क्योंकि इसके सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधानसभाओं के जरिए होता है। हालांकि, अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा आदिवासी समुदायों से आने वाले नेताओं को राज्यसभा भेजा जाता है। वर्तमान में राज्यसभा में आदिवासी सांसदों की संख्या लगभग **6 से 8** के बीच रहती है। ## 3. आदिवासी सांसद संसद में अपनी आवाज़ मजबूती से क्यों नहीं उठा पा रहे हैं? यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील राजनीतिक सवाल है। अक्सर यह आलोचना होती है कि संसद में इतनी बड़ी संख्या (लगभग 50+ सांसद) होने के बावजूद आदिवासियों से जुड़े बुनियादी मुद्दों (जैसे विस्थापन, जल-जंगल-जमीन के अधिकार, मणिपुर हिंसा या हसदेव जंगल की कटाई) पर तीखी आवाज़ नहीं गूंजती। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: ### क) 'व्हिप' (Whip) और दलीय अनुशासन का दबाव भारत की संसदीय व्यवस्था में कोई भी सांसद अपनी मर्जी से संसद में बयान या वोट नहीं दे सकता। सभी राजनीतिक दल **'व्हिप' (Whip)** जारी करते हैं। यदि कोई आदिवासी सांसद अपनी पार्टी की लाइन से अलग हटकर अपनी ही सरकार या नीतियों के खिलाफ बोलता है, तो दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। इसलिए सांसदों को अपनी जातीय या क्षेत्रीय अस्मिता से ऊपर उठकर पार्टी के एजेंडे को प्राथमिकता देनी पड़ती है। ### ख) स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व का अभाव आरक्षित सीटों से चुनाव जीतने वाले अधिकांश आदिवासी सांसद देश के बड़े राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दलों (जैसे भाजपा, कांग्रेस, टीएमसी आदि) के टिकट पर जीतते हैं। चूंकि वे किसी स्वतंत्र आदिवासी केंद्रित दल से नहीं आते, इसलिए उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएं और वफादारी उनकी पार्टी के प्रति अधिक होती है, न कि केवल अपने समाज के प्रति। ### ग) चुनावी राजनीति का स्वरूप आरक्षित सीटों (ST Seats) पर भले ही उम्मीदवार आदिवासी होता है, लेकिन उस क्षेत्र के सभी मतदाता (जिसमें गैर-आदिवासी भी शामिल हैं) वोट डालते हैं। कई क्षेत्रों में गैर-आदिवासी मतदाताओं की संख्या निर्णायक होती है। ऐसे में जीतने के लिए आदिवासी उम्मीदवार को अन्य समुदायों के हितों और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की मर्जी का भी ध्यान रखना पड़ता है। ### घ) 'टोकन प्रतिनिधित्व' (Token Representation) राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलों द्वारा अक्सर ऐसे आदिवासी चेहरों को आगे बढ़ाया जाता है जो पार्टी के प्रति वफादार और शांत स्वभाव के हों। उग्र या क्रांतिकारी रूप से आदिवासियों के हक की बात करने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं को मुख्यधारा की पार्टियां टिकट देने से कतराती हैं। ### ङ) राष्ट्रीय मीडिया और चर्चाओं में अनदेखी यदि कोई सांसद संसद में शून्यकाल (Zero Hour) या नियम 377 के तहत मुद्दे उठाता भी है, तो राष्ट्रीय मीडिया और विमर्श में उन मुद्दों को उतनी जगह नहीं मिलती, जितनी राजनीतिक उठापटक को मिलती है। इससे यह आभास होता है कि संसद में उनकी आवाज बिल्कुल गायब है। ### निष्कर्ष संक्षेप में कहें तो, **'अनुसूचित जनजाति'** शब्द का चयन देश के शुरुआती दौर में कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए किया गया था। लेकिन आज, **'आदिवासी'** शब्द की मांग आत्म-सम्मान, अपनी प्राचीन पहचान को पुनः प्राप्त करने और जल-जंगल-जमीन पर अपने ऐतिहासिक अधिकारों को मजबूती से रेखांकित करने का एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन बन चुकी है।

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