भारत में कैसे बेरोजगार प्रोफेशनल प्रोक्ष रूप से दहेज प्रथा को बड़ा रहे हैं?

भारत में दहेज प्रथा (Dowry System) का स्वरूप अब पहले जैसा नहीं रहा। आज के समय में "पढ़े-लिखे और प्रोफेशनल" लोग सीधे तौर पर पैसे माँगने के बजाय परोक्ष (indirect) तरीके अपना रहे हैं, जो इस कुरीति को और भी ज्यादा गहरा और 'महिमामंडित' बना रहा है। यहाँ कुछ तरीके दिए गए हैं जिनसे बेरोजगार या करियर के शुरुआती दौर में खड़े प्रोफेशनल्स इसे बढ़ावा दे रहे हैं: 1. "स्टेटस" और "स्टैंडर्ड" का हवाला आजकल सीधे "कैश" नहीं माँगा जाता। इसके बजाय, प्रोफेशनल युवा और उनके परिवार यह कहते हैं कि "हमें कुछ नहीं चाहिए, बस अपनी बेटी को उसके स्टैंडर्ड के हिसाब से विदा करना।" यह एक मनोवैज्ञानिक दबाव है जो लड़की वालों को महंगी गाड़ियाँ, लग्जरी फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक्स देने पर मजबूर करता है ताकि "प्रोफेशनल" दूल्हे की गरिमा बनी रहे। 2. करियर में 'इन्वेस्टमेंट' के रूप में दहेज कई बेरोजगार प्रोफेशनल्स (जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र या स्ट्रगलिंग स्टार्टअप फाउंडर्स) शादी को एक 'फंडिंग सोर्स' की तरह देखते हैं। * बिजनेस स्टार्टअप: ससुर से बिजनेस शुरू करने के लिए "मदद" माँगना। * उच्च शिक्षा: विदेश जाकर पढ़ाई करने या महंगे प्रोफेशनल कोर्स की फीस के लिए ससुराल पर निर्भर होना। 3. "गिफ्ट्स" की आड़ में लेन-देन प्रोफेशनल्स अक्सर इसे 'दहेज' का नाम देने से बचते हैं। वे इसे "प्री-वेडिंग गिफ्ट्स", "हनीमून पैकेज" या "शादी का खर्च आधा-आधा बांटना" (जो अक्सर लड़की वालों पर ही भारी पड़ता है) जैसे आधुनिक शब्दों से ढक देते हैं। 4. सोशल मीडिया और दिखावा आज के दौर में शादियाँ केवल दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम और फेसबुक के लिए एक 'शो' बन गई हैं। प्रोफेशनल्स एक "डेस्टिनेशन वेडिंग" या "ग्रैंड एंट्री" की मांग करते हैं। यह दिखावा अप्रत्यक्ष रूप से लड़की के परिवार पर वित्तीय बोझ डालता है, जो दहेज का ही एक आधुनिक रूप है। 5. योग्यता का 'बाजार मूल्य' (Market Value) भले ही युवा अभी बेरोजगार हो, लेकिन उसकी डिग्री (IIT, IIM, UPSC Aspirant, Doctor) के आधार पर एक अदृश्य 'रेट कार्ड' तैयार किया जाता है। परिवार का तर्क होता है कि "हमने इसकी पढ़ाई पर लाखों खर्च किए हैं, तो हमें भी वैसा ही परिवार चाहिए जो खर्च कर सके।" > कड़वा सच: शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को नैतिक बनाना था, लेकिन विडंबना यह है कि उच्च शिक्षा अब अक्सर "दहेज की दर" बढ़ाने का पैमाना बन गई है। जब एक प्रोफेशनल चुप रहकर अपने परिवार की इन मांगों का समर्थन करता है, तो वह भी इस अपराध में बराबर का भागीदार होता है।

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