विशेष क्षेत्र (जैसे खनन क्षेत्र के लिए नियम) के राजस्व बढ़ोतरी और इसके साथ पर्यावरण संरक्षण के बारे में विस्तार से चर्चा ?

खनन (Mining) क्षेत्र किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए 'सोने का अंडा देने वाली मुर्गी' की तरह है, लेकिन अगर सावधानी न बरती जाए तो यह पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान भी पहुंचाता है। भारत सरकार ने MMDR (संशोधन) अधिनियम 2025 और ऑफशोर एरिया मिनरल रूल्स 2026 के माध्यम से राजस्व बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश की है। यहाँ इसके मुख्य बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है: 1. राजस्व बढ़ोतरी के लिए नए नियम (Revenue Growth) सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए तकनीक और पारदर्शिता को आधार बनाया है: * नीलामी आधारित आवंटन (Auction-based Allocation): अब खनिज ब्लॉकों का आवंटन "पहले आओ, पहले पाओ" के बजाय पारदर्शी ई-नीलामी के जरिए होता है, जिससे सरकारी खजाने में अधिक पैसा आता है। * खनिज विनिमय (Mineral Exchange): 2025 के नियमों के तहत 'खनिज एक्सचेंज' स्थापित किए जा रहे हैं। यह एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है जहाँ खनिजों की खरीद-बिक्री वास्तविक बाजार दरों पर होगी, जिससे राजस्व में पारदर्शिता आएगी। * कैप्टिव खदानों पर छूट: अब कैप्टिव खदानें (जो अपनी खपत के लिए खदान रखती थीं) अपनी कुल उपज का एक बड़ा हिस्सा खुले बाजार में बेच सकती हैं, जिससे उनका उत्पादन और सरकार का टैक्स दोनों बढ़ेंगे। * अवैध खनन पर नकेल (2026 के नियम): 'ऑफशोर एरिया मिनरल रूल्स 2026' के तहत जहाजों की रियल-टाइम ट्रैकिंग और डिजिटल ट्रांजिट परमिट अनिवार्य कर दिए गए हैं। चोरी रुकने का सीधा मतलब है राजस्व में वृद्धि। 2. पर्यावरण संरक्षण के कड़े मानक (Environmental Protection) खनन के कारण होने वाले विनाश को रोकने के लिए अब केवल जुर्माना नहीं, बल्कि 'पुनर्स्थापन' (Restoration) पर जोर है: * पर्यावरण संरक्षण कोष (Environmental Protection Fund 2026): सरकार ने एक नया फंड बनाया है जिसमें खनन कंपनियों पर लगाए गए जुर्माने का पैसा जमा होता है। इस राशि का उपयोग केवल प्रभावित क्षेत्रों में वृक्षारोपण और मिट्टी सुधार के लिए किया जा सकता है। * डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF): खनन से प्रभावित स्थानीय लोगों और पर्यावरण के सुधार के लिए कंपनियां अपनी रॉयल्टी का एक हिस्सा इस फंड में देती हैं। * स्टार रेटिंग प्रणाली: खदानों को उनके पर्यावरणीय प्रदर्शन (धूल नियंत्रण, जल संरक्षण, हरियाली) के आधार पर 1 से 5 स्टार दिए जाते हैं। कम रेटिंग वाली खदानों का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। 3. तकनीक: राजस्व और पर्यावरण का संगम भविष्य का खनन "स्मार्ट और ग्रीन" होगा: * जियो-फेंसिंग और ड्रोन निगरानी: खदान की सीमाओं की जियो-फेंसिंग की जाती है ताकि कोई निर्धारित क्षेत्र से बाहर खनन न कर सके। ड्रोन के जरिए हर महीने खुदाई की मात्रा की जांच होती है। * जीरो वेस्ट माइनिंग (Zero Waste Mining): पहले जिसे 'वेस्ट' (Overburden) मानकर फेंक दिया जाता था, अब उससे एम-सैंड (M-Sand) या निर्माण सामग्री बनाने के नियम हैं। इससे कचरा कम होता है और अतिरिक्त कमाई भी होती है। राजस्व और पर्यावरण का तुलनात्मक मॉडल | कारक | राजस्व पक्ष (Revenue) | संरक्षण पक्ष (Conservation) | |---|---|---| | प्रौद्योगिकी | ऑटोमेशन से उत्पादन में वृद्धि। | इलेक्ट्रिक मशीनों से कार्बन उत्सर्जन में कमी। | | निगरानी | चोरी रुकने से सरकारी खजाने में वृद्धि। | अवैध खुदाई रुकने से जंगलों की सुरक्षा। | | अपशिष्ट प्रबंधन | 'वेस्ट' को बेचकर अतिरिक्त आय। | कचरे के निस्तारण से भूमि प्रदूषण में कमी। | | रॉयल्टी | क्रिटिकल मिनरल्स (लिथियम आदि) पर उच्च रॉयल्टी। | NMET फंड के जरिए पर्यावरण शोध पर खर्च। | इस क्षेत्र में एसोसिएशन/यूनियन की भूमिका भविष्य के खनन में यूनियनें केवल मजदूरों की मांगों तक सीमित नहीं रहेंगी: * वे 'सस्टेनेबल माइनिंग सर्टिफिकेट' दिलाने में मदद करेंगी। * वे यह सुनिश्चित करेंगी कि खदान मालिक पर्यावरण नियमों का पालन कर रहे हैं, ताकि पूरी इंडस्ट्री पर प्रतिबंध लगने की नौबत न आए। * स्थानीय समुदायों और बड़ी कंपनियों के बीच 'सोशल लाइसेंस टू ऑपरेट' (सामाजिक सहमति) बनाने में मध्यस्थता करेंगी। > निष्कर्ष: राजस्व बढ़ाने का मंत्र अब "ज्यादा खुदाई" नहीं, बल्कि "स्मार्ट खुदाई और पूर्ण उपयोग" है। 2026 तक भारत का लक्ष्य खनन क्षेत्र का जीडीपी योगदान 2.5% से बढ़ाकर 5% करना है, लेकिन 'नेट जीरो' उत्सर्जन के वादे के साथ।

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