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भारतीय पौराणिक कथाओं और दर्शन के अनुसार, यह एक बहुत ही गहरा और रोचक प्रश्न है। इसका संक्षिप्त उत्तर है: हाँ, तकनीकी रूप से एक ब्रह्मर्षि के पास इतनी शक्ति होती है, लेकिन इसके पीछे के 'क्यों' और 'कैसे' को समझना ज़रूरी है।
यहाँ इसके मुख्य पहलू दिए गए हैं:
1. विश्वामित्र और 'प्रति-सृष्टि' का उदाहरण
हिंदू पुराणों में ऋषि विश्वामित्र का उदाहरण सबसे प्रमुख है। जब राजा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग से निकाल दिया गया, तब विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर उनके लिए एक अलग स्वर्ग और नक्षत्र मंडल की रचना शुरू कर दी थी। उन्होंने नए तारे और एक नई व्यवस्था बनानी शुरू की थी, जिसे 'प्रति-सृष्टि' कहा जाता है।
2. 'अहं ब्रह्मास्मि' की स्थिति
ब्रह्मर्षि वह है जिसने 'ब्रह्म' को जान लिया है और जो स्वयं ब्रह्म में लीन हो गया है। चूंकि ब्रह्म ही इस पूरे ब्रह्मांड का स्रोत है, इसलिए उस अवस्था को प्राप्त करने वाला व्यक्ति सैद्धांतिक रूप से सृष्टि करने की क्षमता (Sankalpa Shakti) रखता है। उनके संकल्प मात्र से चीजें अस्तित्व में आ सकती हैं।
3. शक्ति बनाम इच्छा (The Paradox of Ego)
यहाँ एक दिलचस्प मोड़ आता है। एक व्यक्ति 'ब्रह्मर्षि' तभी बन पाता है जब उसका अहंकार (Ego) पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
* सृष्टि बनाने की इच्छा: आमतौर पर कुछ नया बनाने या अपना 'साम्राज्य' खड़ा करने की इच्छा अहंकार से उपजती है।
* ब्रह्मर्षि की स्थिति: जब कोई व्यक्ति इस पद पर पहुँचता है, तो उसकी अपनी कोई निजी इच्छा नहीं बचती। वह प्रकृति के साथ एकाकार हो जाता है।
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4. सिद्धियाँ और ब्रह्मांडीय नियम
योग शास्त्र के अनुसार, 'अणिमा', 'महिमा' जैसी अष्ट सिद्धियों के माध्यम से योगी भौतिक संसार के नियमों को बदल सकता है। एक ब्रह्मर्षि इन सिद्धियों से कहीं ऊपर होता है। वे अपनी मानसिक शक्ति से एक नया 'लोका' या आयाम (Dimension) बना सकते हैं, लेकिन वे ऐसा तभी करते हैं जब ब्रह्मांडीय संतुलन (Cosmic Balance) के लिए इसकी आवश्यकता हो।
निष्कर्ष:
एक ब्रह्मर्षि में अपनी गैलेक्सी बनाने की क्षमता तो होती है, लेकिन उस स्तर पर पहुँचने के बाद उनमें ऐसा करने की इच्छा नहीं रह जाती, क्योंकि उनके लिए पूरा ब्रह्मांड ही उनका अपना स्वरूप होता है।
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