लोकतन्त्र देशों में गिरता राजनीति का संवाद स्तर और नेताओं को अनुभवहीन होना ?

 


यह लोकतंत्र के सामने मौजूद सबसे गंभीर और बुनियादी संकटों में से एक है। समाज की तकनीक और अर्थव्यवस्था जिस रफ्तार से बदल रही है, लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसके नेता उस गति से तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं।

इस पूरी समस्या और इसके मुख्य कारणों को तीन प्रमुख हिस्सों में समझा जा सकता है:

1. गिरता हुआ राजनीतिक संवाद और सतही बहस

  • मुद्दों के बजाय व्यक्ति पर केंद्रित संवाद: नीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जटिल विषयों पर दीर्घकालिक नीतियां बनाने के बजाय, संवाद व्यक्तिगत आरोपों, नारों और भावनात्मक ध्रुवीकरण तक सीमित होकर रह गया है।
  • सोशल मीडिया और 'शॉर्ट-अटेंशन स्पैन': सोशल मीडिया के इस दौर में 15 सेकंड की रील्स या 'वन-लाइनर' ट्रोल्स अधिक वायरल होते हैं। जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समाधान त्वरित ट्वीट्स में नहीं हो सकता, लेकिन नेता चुनावी लाभ के लिए सतही और उत्तेजक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
  • संसदीय बहस का घटता स्तर: सदनों में विधेयक बिना किसी गहन अध्ययन, संसदीय समितियों की समीक्षा या तर्कपूर्ण चर्चा के जल्दबाज़ी में पारित हो रहे हैं, जिससे कानूनों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

2. नेताओं में दूरदर्शिता और नीतिगत अनुभव की कमी

  • चुनावी जीत बनाम प्रशासनिक क्षमता: वर्तमान व्यवस्था में लोकप्रिय होना या चुनाव जीतना एक कौशल बन गया है, जबकि शासन चलाना, अर्थव्यवस्था समझना और नीतियां लागू करना एक अलग विषय है। कई बार अनुभवहीन नेता बिना जमीनी समझ के शीर्ष पदों पर पहुँच जाते हैं।
  • शॉर्ट-टर्म पॉलिटिक्स (5 साल का चक्र): अधिकांश नेता केवल अगले चुनाव तक का सोचते हैं। वे ऐसे कड़े और दूरगामी सुधार करने से बचते हैं जिनका फल 10-15 साल बाद मिले, क्योंकि वे तत्काल चुनावी लाभ देने वाली मुफ़्त योजनाओं (Freebies) पर अधिक निर्भर हो जाते हैं।

3. सामाजिक, व्यावसायिक और तकनीकी बदलावों की गति बनाम धीमी सरकारी मशीनरी

  • रोजगार और व्यवसाय का बदलता स्वरूप: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ऑटोमेशन और 'गिग इकोनॉमी' (Gig Economy) ने काम करने के पारंपरिक तरीकों को बदल दिया है। लेकिन हमारे शिक्षा और रोजगार नीतियां अभी भी 20वीं सदी के ढर्रे पर चल रही हैं।
  • सामाजिक सुरक्षा और नीतिगत अंतर: पारंपरिक नौकरियां खत्म हो रही हैं और नए तरीके के ठेकेदारी या स्वतंत्र काम बढ़ रहे हैं। सरकारों के पास इन नए डिजिटल और गिग वर्करों के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा (स्वास्थ्य, पेंशन, दुर्घटना बीमा) की कोई त्वरित नीति नहीं है।
  • नौकरशाही का धीमापन: लालफीताशाही (Bureaucracy) और जटिल कानूनी प्रक्रियाएं नए व्यावसायिक माहौल और सामाजिक जरूरतों के अनुसार खुद को तुरंत नहीं ढाल पातीं। 

समाधान के संभावित रास्ते

  • संसदीय समितियों को मजबूत करना: प्रत्येक महत्वपूर्ण कानून को जनता और विशेषज्ञों के परामर्श के लिए अनिवार्य रूप से संसदीय समितियों के पास भेजा जाना चाहिए।
  • गिग इकोनॉमी और AI के लिए आधुनिक ढांचा: सरकार को तुरंत नई तकनीक और बदलते रोजगार के अनुरूप सुरक्षा नीतियां तैयार करनी होंगी।
  • नागरिकों का जागरूक होना: जब तक मतदाता नेताओं से भावनात्मक मुद्दों के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और दीर्घकालिक विकास पर सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक संवाद का स्तर बदलना मुश्किल है।

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