भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय मुद्रा अन्य विकसित देशों की मुद्रा की तरह कैसे बन सकती है व्यापार के लिए मुख्य मुद्रा ?

 


भारतीय रुपये (INR) को अमेरिकी डॉलर, यूरो या जापानी येन जैसी प्रमुख वैश्विक और विकसित देशों की मुद्राओं की तरह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की मुख्य मुद्रा बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार कई कदम उठा रहे हैं। किसी मुद्रा को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य बनाने की यह प्रक्रिया रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण (Internationalisation of Rupee) कहलाती है।

रुपये को प्रमुख वैश्विक व्यापारिक मुद्रा बनाने के लिए निम्नलिखित मुख्य कदम और नीतियां आवश्यक हैं:

1. विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते (SRVA) की व्यवस्था भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी बैंकों के साथ भारतीय रुपये में व्यापारिक लेनदेन को सुगम बनाने के लिए विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते (Special Rupee Vostro Accounts) खोलने की अनुमति दी है। इसके तहत, यदि कोई देश भारत के साथ व्यापार करना चाहता है, तो वह अपने देश के अधिकृत बैंकों के माध्यम से भारत में वोस्ट्रो खाते खोलकर सीधे रुपये में आयात-निर्यात का भुगतान और निपटान (Settlement) कर सकता है। अब तक कई देश इस प्रणाली से जुड़ चुके हैं।

2. द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उपयोग भारत सरकार उन देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते (Bilateral Agreements) कर रही है जो अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त Arab Emirates (UAE) और अन्य देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं (रुपया और दिरहम) में व्यापार करने के लिए समझौते किए गए हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर रुपये की मांग बढ़ती है।

3. पूंजी खाता परिवर्तनीयता (Capital Account Convertibility) की ओर कदम विकसित देशों की मुद्राएं इसलिए मजबूत होती हैं क्योंकि उन्हें दुनिया में कहीं भी स्वतंत्र रूप से अन्य मुद्राओं में बदला जा सकता है। भारत को भी धीरे-धीरे अपनी अर्थव्यवस्था को अधिक खुला बनाते हुए पूंजी खाते की परिवर्तनीयता की ओर बढ़ना होगा, ताकि विदेशी निवेशक और व्यापारी बिना किसी कठोर पाबंदी के रुपये में निवेश कर सकें और उसे बाहर ले जा सकें।

4. गहरे और तरल बॉन्ड बाजार (Deep and Liquid Bond Markets) अंतरराष्ट्रीय निवेशक या अन्य देश अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों (Government Bonds) और सुरक्षित वित्तीय परिसंपत्तियों में रखते हैं। रुपये को वैश्विक आरक्षित मुद्रा (Reserve Currency) बनाने के लिए भारत को अपने घरेलू ऋण और बॉन्ड बाजार को और अधिक गहरा, पारदर्शी और विदेशी निवेशकों के लिए सुलभ बनाना होगा ताकि वे भारी मात्रा में रुपये आधारित परिसंपत्तियां रख सकें।

5. मुद्रास्फीति (Inflation) पर नियंत्रण और आर्थिक स्थिरता किसी भी मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता उसकी क्रय शक्ति की स्थिरता पर निर्भर करती है। यदि भारत महंगाई दर को एक निश्चित और संतुलित दायरे में रखता है, तो वैश्विक बाजार में निवेशकों और अन्य देशों का रुपये के मूल्य पर भरोसा बढ़ेगा।

6. वैश्विक वित्तीय प्रणालियों और भुगतान तंत्र से एकीकरण अंतरराष्ट्रीय व्यापार में निर्बाध लेनदेन के लिए भारतीय भुगतान प्रणालियों (जैसे UPI और RTGS) को वैश्विक वित्तीय नेटवर्क के साथ जोड़ना और वैकल्पिक संदेश प्रणाली (जैसे SWIFT के विकल्प) को मजबूत करना जरूरी है ताकि भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद रुपये में सीमा-पार भुगतान सुरक्षित रूप से हो सके।

रुपये का वैश्विक मुद्रा बनना एक रातों-रात होने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक क्रमिक और दीर्घकालिक आर्थिक यात्रा है, जिसके लिए भारत अपनी अर्थव्यवस्था के आकार, विनिर्माण क्षमता और निर्यात को लगातार मजबूत कर रहा है।

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