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उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित जौनसार-बावर क्षेत्र को भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) में शामिल करने की मांग लंबे समय से की जा रही है। यद्यपि 1967 में जौनसार-बावर को 'जनजातीय क्षेत्र' (ST Zone) घोषित कर दिया गया था, लेकिन पांचवीं अनुसूची के तहत मिलने वाले संवैधानिक अधिकार और विशेष स्वायत्तता इस क्षेत्र को पूरी तरह से प्राप्त नहीं हुई हैं।
जौनसार-बावर को पांचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं:
1. जल, जंगल और जमीन पर अधिकारों की सुरक्षा
पांचवीं अनुसूची लागू होने से जनजातीय लोगों की जमीन गैर-जनजातीय (बाहरी) लोगों को बेचने या हस्तांतरित करने पर संवैधानिक रोक लग जाती है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि बढ़ते शहरीकरण और भू-माफियाओं के प्रभाव से उनकी पारंपरिक जमीनों को बचाने के लिए यह सुरक्षा आवश्यक है।
2. स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और रीति-रिवाजों का संरक्षण
जौनसार-बावर की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति, भाषा (जौनसारी), उत्सव और पारंपरिक न्याय प्रणाली है। पांचवीं अनुसूची के तहत क्षेत्र को सांस्कृतिक स्वायत्तता मिलती है, जिससे बाहरी सांस्कृतिक हस्तक्षेप से बचाव होता है।
3. जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) का गठन
पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों या क्षेत्रों में जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council) का गठन अनिवार्य होता है। इसमें स्थानीय जनजातीय प्रतिनिधि शामिल होते हैं, जो सीधे तौर पर क्षेत्र के विकास, कानूनों और योजनाओं पर निर्णय ले सकते हैं।
4. पेसा (PESA) कानून लागू होने का अधिकार
पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत पेसा अधिनियम (PESA Act - Panchayats Extension to Scheduled Areas Act, 1996) लागू करने का मार्ग प्रशस्त होता है। पेसा कानून से ग्राम सभाओं को अभूतपूर्व शक्तियां मिलती हैं, जिससे स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों और निर्णयों पर ग्राम सभा का सीधा नियंत्रण स्थापित होता है।
5. केंद्रीय बजट और विशेष वित्तीय सहायता
पांचवीं अनुसूची में शामिल क्षेत्रों को केंद्र सरकार से जनजातीय उप-योजनाओं (Tribal Sub-Plan) के तहत सीधा और विशेष वित्तीय अनुदान मिलता है, जिससे क्षेत्र में बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार तेजी से हो सकता है।
6. भौगोलिक विषमता और आर्थिक पिछड़ापन
पहाड़ी व दुर्गम इलाका होने के कारण यह क्षेत्र आज भी विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह नहीं जुड़ सका है। संवैधानिक संरक्षण मिलने से इस क्षेत्र के विकास के लिए विशेष नीतियां बनाई जा सकेंगी।
##### जौनसार-बावर में 'पटनाला एक्ट' (Panalal Act / Khat-Khatana Traditions) और 'हक-हकूक' (Customary Rights) की व्यवस्था स्वतंत्रता-पूर्व (ब्रिटिश काल) से चली आ रही है, जो इस क्षेत्र के ग्रामीणों को वनों पर विशेष पारंपरिक अधिकार प्रदान करती है।
इस व्यवस्था के तहत ग्रामीणों को कई तरह की सहूलियतें और अधिकार प्राप्त हैं:
* काठ-पटनाला (इमारती लकड़ी): मकान बनाने या मरम्मत के लिए प्रत्येक परिवार को वन विभाग द्वारा निर्धारित दरों/नियमों के तहत रियायती या नि:शुल्क लकड़ी मिलती है।
* बलोटा एवं ईंधन लकड़ी: खाना पकाने और सर्दियों में तापने के लिए सूखी लकड़ी और पत्तियां (Patti Kaatna) एकत्र करने का अधिकार।
* चारागाह अधिकार: मवेशियों को जंगलों में चराने और घास/पत्तियां काटने की छूट।
* पानी के स्रोत (पनचक्की/गूल): स्थानीय प्राकृतिक जल स्रोतों के इस्तेमाल पर ग्रामीणों का पारंपरिक अधिकार।
फिर भी पांचवीं अनुसूची की मांग क्यों की जा रही है?
पटनाला एक्ट स्थानीय स्तर पर वनों के उपयोग का हक तो देता है, लेकिन वर्तमान में यह अधिकार वन विभाग के प्रशासनिक नियमों और नियंत्रण के अधीन है। स्थानीय जन-प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं का तर्क है कि पटनाला एक्ट की तुलना में पांचवीं अनुसूची अधिक मजबूत और व्यापक संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करती है:
| बिंदु | पटनाला एक्ट / हक-हकूक | पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) + PESA |
|---|---|---|
| संरक्षण का दायरा | केवल जंगल और लकड़ी/चारा के पारंपरिक उपयोग तक सीमित है। | जल, जंगल, जमीन, खनिज और संपूर्ण भू-भाग पर संवैधानिक सुरक्षा देती है। |
| जमीन का हस्तांतरण | बाहरी लोगों को जमीन बेचने/खरीदने पर पूरी तरह कानूनी रोक नहीं लगाता। | गैर-आदिवासियों को जमीन बेचने/हस्तांतरित करने पर सख्त संवैधानिक प्रतिबंध लगाता है। |
| अधिकार का स्रोत | वन विभाग के नियमों और विभागीय नीतियों पर निर्भर है। | संविधान के अनुच्छेद 244(1) द्वारा प्रदत्त मूल संवैधानिक अधिकार है। |
| निर्णय लेने की शक्ति | निर्णय अंतिम रूप से वन विभाग/प्रशासन के हाथ में होता है। | निर्णय ग्राम सभा और जनजातीय सलाहकार परिषद के हाथ में होता है। |
पटनाला एक्ट ने जौनसार-बावर के लोगों के दैनिक जीवन और वनों के साथ उनके संबंध को बचाकर रखने में बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन भूमि हस्तांतरण रोकने और पूर्ण स्वायत्तता के लिए पांचवीं अनुसूची की मांग को उससे एक कदम आगे का संवैधानिक सुरक्षा चक्र माना जाता है।
### विस्थापन और बांध परियोजनाएं: बिना जन-सुनवाई (Public Hearing) और बिना सहमति के विस्थापन करना अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विपरीत है।
“जौनसार-बावर में जल-विद्युत परियोजनाओं और कॉरपोरेट दखल के कारण आदिवासियों की पारंपरिक जमीनों का बिना सहमति हस्तांतरण हो रहा है। ऐसे मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने का एकमात्र संवैधानिक समाधान इस क्षेत्र को पांचवीं अनुसूची में शामिल करना और PESA अधिनियम लागू करना है।”
> संक्षेप में: जौनसार-बावर को पांचवीं अनुसूची में शामिल करने का मुख्य उद्देश्य केवल राजनीतिक या प्रशासनिक दर्जा हासिल करना नहीं, बल्कि भू-अधिकारों की सुरक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और 'पेसा' के माध्यम से स्वायत्त शासन (Self-Governance) प्राप्त करना है।
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