कालसी हरि प्रयाग राजा अशोक के समय इतना प्रसिद्ध तो क्या चार मासू देवता मंदिर भी इतना ही प्रसिद्ध था जोकि आदिवासी जौनसारी खस समुदाय का आराध्य है ?

कालसी और हरिपुर (हरि प्रयाग) का इतिहास बहुत प्राचीन और समृद्ध रहा है। सम्राट अशोक के शिलालेख के कारण यह क्षेत्र तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध और व्यापारिक व धार्मिक गतिविधियों का केंद्र था। महाशू देवता एवं स्थानीय देव परंपरा जिस प्रकार कालसी का ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व था, उसी प्रकार जौनसार-बावर और खस समुदाय में महाशू (चार महाशू) देवता का धार्मिक और सांस्कृतिक स्थान अत्यंत उच्च और सर्वोपरि रहा है: * ऐतिहासिक प्रसिद्धि: प्राचीन काल में कालसी/हरिपुर मुख्य मार्ग और प्रशासनिक केंद्र होने के कारण बाहरी साम्राज्यीय अभिलेखों (जैसे अशोक के शिलालेख) में दर्ज हुआ। महाशू देवता का केंद्र (हनोल) भौगोलिक रूप से दुर्गम पहाड़ी अंचल में होने के कारण मुख्यधारा के लिखित इतिहास की जगह मौखिक परंपराओं (जागर, पांडव नृत्य और लोकगाथाओं) में अधिक सुरक्षित रहा। परंतु स्थानीय खस और जौनसारी समाज के लिए महाशू देवता की मान्यता कालसी जितनी ही प्राचीन और गहरी थी। * संबद्ध देवगण एवं परंपरा: महाशू परंपरा केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरा एक देव-मंडल (Divine Hierarchy) है: * चार महाशू भाई: बासिक, बोथा, पाबासिक और चालदा महाशू। * सहयोगी देव एवं बीर गण: सिलगुरु देवता, विजट (विजट महाराज), नरसिंह देवता, परशुराम, माँ भीमा देवी (जिन्हें अब दुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है), और काली माता इस विस्तृत लोक-देव परंपरा का प्रमुख हिस्सा हैं। इनके साथ ही देव-सेना के 'बीर' (जैसे कि कड़ा बीर, शुकदेव बीर, कयलू ,सेकुडया आदि) को भी क्षेत्र की सुरक्षा और लोक-कल्याण का रक्षक माना जाता रहा है। बदराज मंदिर (भिनार क्षेत्र) और बाद में एक चीन श्रद्धालुओं द्वारा आदिवासी जौनसार क्षेत्र के ग्राम-लूहन के पहाड़ी चोटी की सीमा पर मंदिर स्थापित करा गया था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज मसूरी-विकासनगर मार्ग के पास भिनार/दूधली ग्राम-मटोगि क्षेत्र में स्थित बदराज मंदिर जितना लोकप्रिय है, इसका आध्यात्मिक महत्व प्राचीन काल में भी उतना ही प्रबल था: * प्राचीन मान्यता: बदराज मंदिर को भगवान कृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम (बलभद्र) का स्वरूप माना जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में पशुधन की रक्षा और कृषि समृद्धि के लिए बदराज महाराज की पूजा की प्राचीन परंपरा रही है। * संस्कृति का संगम: प्राचीन काल में जब कालसी व्यापार और धर्म का बड़ा केंद्र था, तब बदराज क्षेत्र योग, साधना और ध्यान के लिए एक शांत और पवित्र स्थल माना जाता था और वही सभी श्रद्धालुओं के साथ आदिवासी खस समुदाय के लोग भी मात्रि स्नान(परि स्नान) करते थे माँ यमुना घाट पर । बौद्ध साधना, हिंदू पूजा और अश्वमेध यज्ञ यमुना और टोंस नदी के संगम पर स्थित यह संपूर्ण क्षेत्र (कालसी, हरिपुर, जगतग्राम) धार्मिक सहअस्तित्व और महान अनुष्ठानों का साक्षी रहा है: * बौद्ध और हिंदू धर्म का संगम: प्राचीन काल में कालसी से होकर तिब्बत और मध्य एशिया के व्यापारिक मार्ग गुजरते थे। चीन के प्रसिद्ध बौद्ध यात्री ह्वेनसांग (Hiuen Tsang) ने भी अपने यात्रा वृत्तांत में शुद्धनगर (कालसी क्षेत्र) का उल्लेख किया है, जहाँ कई बौद्ध स्तूप और मठ थे। यहाँ बौद्ध भिक्षु योग-साधना करते थे और साथ ही सनातन हिंदू परंपरा के मंदिर और आश्रम भी विद्यमान थे। * अश्वमेध यज्ञ (जगतग्राम): कालसी के पास जगतग्राम में तीसरी शताब्दी ईस्वी (लगभग 250 ईस्वी) में राजा शीलवर्मन (यौधेय राजवंश) द्वारा कराए गए अश्वमेध यज्ञ की ईंटों से बनी वेदिकाएँ (गरुड़ के आकार की यज्ञवेदी) पुरातात्विक उत्खनन में मिली हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यह क्षेत्र केवल बौद्ध धर्म ही नहीं, बल्कि वैदिक सनातन संस्कृति और सम्राटों के शक्ति-प्रदर्शन (अश्वमेध यज्ञ) का भी मुख्य केंद्र था। कालसी और हरिपुर जहाँ राजनीतिक, व्यापारिक और राजकीय यज्ञों का केंद्र थे, वहीं महाशू देवता, बदराज और स्थानीय बीर-गण जौनसार-बावर की अटूट सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आत्मा रहे हैं।

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