सनातन ग्रंथों के अनुसार दिव्य, दैत्य और राक्षस योनियों में "संकल्प" या "मायावी शक्ति" से शारीरिक आकार तुरंत बढ़ जाता था, जबकि प्राकृतिक मनुष्य योनि समय के सामान्य नियम (वर्षों के चक्र) का पालन करती है ?

सनातन दर्शन में सृष्टि और उसमें रहने वाले जीवों के शरीर निर्माण को कर्म, गुण और तत्वों की प्रधानता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है: 1. दिव्य, दैत्य और राक्षस योनियाँ (सूक्ष्म व इच्छारूपी) * तत्वों का प्रभाव: इन योनियों में आकाश, वायु और तेज (अग्नि) तत्वों की प्रधानता होती है। ये भौतिक रूप से उतने कठोर नहीं होते जितना मनुष्य शरीर होता है। * मायावी शक्ति और संकल्प: इन जीवों के पास संकल्प-शक्ति और मायावी विद्या (रूप बदलने की क्षमता) होती है। वे अपने मन के संकल्प या माया से क्षण भर में बाल रूप से विशालकाय रूप धारण कर सकते हैं। * उदाहरण: * राक्षस/दैत्य: घटोत्कच का जन्म होते ही वयस्क हो जाना, या ताड़का का इच्छानुसार विशाल रूप धारण कर लेना। * दिव्य (देवता): भगवान श्री हरि विष्णु का वामन अवतार में तीन पग में संपूर्ण ब्रह्मांड को नाप लेने वाला 'त्रिविक्रम' रूप धारण करना। 2. मनुष्य योनि (स्थूल व नियमबद्ध) * तत्वों का प्रभाव: मनुष्य शरीर में पृथ्वी और जल तत्वों की प्रधानता होती है, जिसके कारण यह अत्यंत स्थूल (भौतिक) और भारी होता है। * कालगति का नियम: मनुष्य योनि पूर्णतः काल (समय) के नियमों, प्रकृति के चक्र और जैविक विकास (Biological Growth) से बंधी हुई है। * संस्कार और आश्रम: इसमें गर्भधारण (9 माह) से लेकर बाल्यावस्था, किशोरावस्था और 16 वर्ष की आयु तक युवावस्था प्राप्त करने की प्रक्रिया प्राकृतिक और नियमबद्ध समय लेती है। संक्षेप में कहें तो, दिव्य व राक्षसी योनियों में "संकल्प से सिद्धि" (Mind over Matter) का नियम काम करता है, जबकि मनुष्य योनि में "प्रकृति और समय का नियम" (Law of Nature and Time) सर्वोपरि रहता है।

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