आज हरिद्वार प्रसिद्ध नगरी है लेकिन उस समय राजा अशोक ने अशोक का शिलालेख क्यों कालसी में स्थापित करा ?

सम्राट अशोक, प्राचीन राजाओं और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा कालसी-हरिपुर क्षेत्र को प्राथमिकता देने और हरिद्वार के बजाय यहाँ गतिविधियाँ केंद्रित करने के पीछे भौगोलिक, व्यापारिक और साम्राज्यवादी कारण थे: 1. सम्राट अशोक ने शिलालेख कालसी में ही क्यों लगवाया, हरिद्वार में क्यों नहीं? * साम्राज्य की सीमा (Border Hub): मौर्य साम्राज्य के समय कालसी उत्तर-पश्चिम सीमा का एक अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक बिंदु था। सम्राट अशोक अपने शिलालेख (Rock Edict) उन स्थानों पर लगवाते थे जो साम्राज्य की सीमाओं पर स्थित हों ताकि पड़ोसी राज्यों, यवनों (यूनानियों) और पहाड़ी जनजातियों तक उनका संदेश पहुँचे। * अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग (Trade Route): प्राचीन काल में कालसी मध्य भारत को तिब्बत, चीन और मध्य एशिया से जोड़ने वाले व्यापारिक 'रेशम मार्ग' (Silk Route / Uttarapatha) का प्रमुख जंक्शन था। उस समय हरिद्वार से अधिक व्यापारिक आवाजाही कालसी के पहाड़ी रास्तों से होती थी। अशोक चाहते थे कि व्यापारी और यात्री उनके धम्म (धर्म) के नियमों को पढ़ें। * यमुना का प्राकृतिक मुहाना: कालसी वह स्थान है जहाँ यमुना नदी पहाड़ों से निकलकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है। प्राचीन समय में नदियों के ऐसे तट ही सबसे बड़े पड़ाव और शहर हुआ करते थे। 2. राजाओं ने अश्वमेध यज्ञ कालसी (बाड़वाला) के पास ही क्यों किए? * राजधानी और शक्ति केंद्र: तीसरी शताब्दी ईस्वी में यहाँ कुणिंद वंश का शासन था। राजा शीलवर्मन ने बाड़वाला (जगतग्राम, विकासनगर) को अपना शक्ति केंद्र बनाया था। चूंकि यह उनकी अपनी राजधानी और साम्राज्य (युगशैल) की भूमि थी, इसलिए उन्होंने अपने साम्राज्य के विस्तार और संप्रभुता को दर्शाने के लिए इसी स्थान पर अश्वमेध यज्ञ करवाए। * हरिद्वार का भिन्न राजनीतिक क्षेत्र: उस दौर में हरिद्वार किसी अन्य राज्य का हिस्सा या घना मैदानी/जंगली क्षेत्र रहा होगा, जबकि कालसी-विकासनगर क्षेत्र प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत मजबूत था। 3. बौद्ध भिक्षु हरिद्वार के स्थान पर कालसी में क्यों बसे? * राजकीय संरक्षण (Royal Patronage): सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने के बाद कालसी को विशेष राजकीय संरक्षण मिला। जहाँ राजा का संरक्षण होता था, वहाँ बौद्ध विहार, मठ और अध्ययन केंद्र तेजी से पनपते थे। * शांत और सुरक्षित वातावरण: बौद्ध भिक्षु ध्यान और अध्ययन के लिए हिमालय की तलहटी में स्थित शांत और प्राकृतिक स्थानों को चुनते थे। कालसी का पहाड़ी और शांत वातावरण ध्यान के लिए आदर्श था। 4. क्या यहाँ और यज्ञशालाएं खुदाई में मिल सकती हैं? हाँ (स्थानीय लोगों केअनुसार) , बिल्कुल मिल सकती हैं और हाल ही में पुरातात्विक खोजें जारी भी हैं। * 1952-54 की खुदाई: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने जब जगतग्राम (बाड़वाला) में पहली बार खुदाई की थी, तब वहाँ तीन गरुड़ाकार (उड़ते हुए बाज के आकार की) यज्ञ वेदिकाएं मिली थीं। इन पर ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ था कि ये राजा शीलवर्मन द्वारा कराए गए अश्वमेध यज्ञ की वेदिकाएं हैं। * 4वीं वेदिका की खोज: इतिहास में राजा शीलवर्मन द्वारा चार अश्वमेध यज्ञ कराए जाने का उल्लेख मिलता है। ASI ने चौथी वेदिका और अन्य प्राचीन अवशेषों को खोजने के लिए जगतग्राम में दोबारा खुदाई (Trial Excavation) का काम शुरू किया था, जिसमें मिट्टी के प्राचीन बर्तन, ईंटें और कोयले के अवशेष मिले हैं। * भविष्य में यदि कालसी और बाड़वाला के विस्तृत क्षेत्र में वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए, तो यहाँ से और भी यज्ञशालाएं, प्राचीन कुषाण/कुणिंद कालीन अवशेष और बौद्ध मठों की नींव मिलने की पूरी संभावना है।

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