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भारतीय संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची मुख्य रूप से आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) आबादी के अधिकारों, उनकी जमीन, संस्कृति और स्वशासन की सुरक्षा के लिए बनाई गई हैं।
इन अनुसूचियों के लागू होने से लाभ भी हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद भी औद्योगिक परियोजनाओं, बांधों, खनन और कॉर्पोरेट अधिग्रहण के कारण आदिवासियों की जमीन और अधिकारों पर बड़ा प्रभाव पड़ा है।
1. पाँचवीं और छठी अनुसूची के प्रावधान और लाभान्वित राज्य
पाँचवीं अनुसूची (5th Schedule)
यह पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर देश के 10 राज्यों में लागू है: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और हिमाचल प्रदेश।
* फायदे:
* गैर-आदिवासियों को जमीन हस्तांतरण पर रोक: राज्यपालों के पास यह शक्ति होती है कि वे आदिवासी जमीन को गैर-आदिवासियों या निजी कंपनियों को बेचने से रोकें।
* PESA कानून (1996): इसके तहत ग्राम सभाओं को भूमि अधिग्रहण, खनिजों के खनन और जल स्रोतों पर निर्णय लेने का अधिकार दिया गया।
* संस्कृति व परंपराओं का संरक्षण: स्थानीय विवादों का निपटारा आदिवासियों के पारंपरिक रीति-रिवाजों से करने का प्रावधान है।
छठी अनुसूची (6th Schedule)
यह पूर्वोत्तर के 4 राज्यों पर लागू है: असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम।
* फायदे:
* स्वायत्त जिला परिषदें (ADCs): इन क्षेत्रों में स्वायत्त परिषदें गठित की जाती हैं, जिनके पास कानून बनाने, कर (Tax) लगाने, और भूमि तथा जंगलों के प्रबंधन का विधायी व न्यायिक अधिकार होता है।
* अधिक स्वायत्तता: यहाँ राज्य या केंद्र सरकार का कोई भी कानून बिना स्वायत्त परिषद की सहमति के सीधे लागू नहीं हो सकता।
2. अनुसूची में होने के बावजूद जमीन का अतिक्रमण और शोषण क्यों हुआ?
संविधान में सुरक्षात्मक प्रावधान होने के बावजूद खनन कंपनियों, बांध परियोजनाओं और निजी उद्यमों द्वारा आदिवासियों के अधिकारों का उल्लंघन लगातार देखा गया है:
1. भूमि अधिग्रहण कानून का दुरुपयोग (Public Purpose Issue)
सरकारें अक्सर "सार्वजनिक हित" (Public Purpose) का हवाला देकर 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम' के तहत जबरन जमीन का अधिग्रहण कर लेती हैं और बाद में वही जमीन निजी या कॉर्पोरेट कंपनियों को लीज पर दे देती हैं।
2. 'सामनता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' (Samatha Judgment) के आदेश का उल्लंघन
1997 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि अनुसूचित क्षेत्रों में सरकारी जमीन भी निजी खनन कंपनियों को नहीं दी जा सकती। लेकिन बाद में कानूनों में लूपहोल्स (गलियों) का फायदा उठाकर लीज जारी रखी गईं।
3. ग्राम सभाओं की सहमति की अनदेखी
PESA कानून के तहत ग्राम सभा की पूर्व सहमति (NOC) अनिवार्य है, लेकिन कई मामलों में फर्जी ग्राम सभा प्रस्ताव तैयार कर कंपनियों को अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) दे दिया जाता है।
4. मुआवजे में धोखाधड़ी और पुनर्वास की विफलता
* मुआवजे का न मिलना या कम मिलना: आदिवासियों के पास आधिकारिक "पट्टा" (भूमि दस्तावेज) न होने के कारण उन्हें मुआवजा पाने के अयोग्य करार दे दिया जाता है।
* सुलभ पुनर्वास का अभाव: केवल नकद मुआवजा देकर छोड़ दिया जाता है, जो कुछ ही समय में खत्म हो जाता है, जबकि उनकी पीढ़ियों की आजीविका (जंगल व जमीन) खत्म हो जाती है।
3. वास्तविक उदाहरण (Case Studies)
* नर्मदा घाटी बांध परियोजना (मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र):
* घटना: सरदार सरोवर बांध के कारण हजारों आदिवासी बेघर हुए।
* प्रभाव: पुनर्वास की नीति कागजों पर रही, लेकिन व्यावहारिक रूप से सही मुआवजा और कृषि भूमि नहीं मिली।
* नियमगिरि बॉक्साइट खनन - वेदांता (ओडिशा):
* घटना: डोंगरिया गोंध आदिवासियों की पवित्र नियमगिरि पहाड़ी पर खनन का प्रयास किया गया।
* परिणाम: यह एक ऐतिहासिक सकारात्मक उदाहरण बना जहाँ 12 ग्राम सभाओं ने एकमत होकर परियोजना को खारिज कर दिया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खनन रुका।
* हसदेव अरण्य खनन (छत्तीसगढ़):
* घटना: पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र होने के बावजूद कोयला खदानों (Coal Blocks) के लिए जंगलों की कटाई और आदिवासियों की जमीनों का अधिग्रहण।
* विवाद: ग्रामीणों का आरोप है कि इसके लिए फर्जी ग्राम सभा प्रस्ताव का सहारा लिया गया।
* कोयल कारो बांध परियोजना (झारखंड):
* घटना: आदिवासियों के भारी विरोध के कारण यह बांध परियोजना अंततः रद्द करनी पड़ी, क्योंकि इससे हजारों एकड़ आदिवासी भूमि जलमग्न हो जाती।
4. अनुसूची प्रणाली के फायदे और नुकसान (तुलनात्मक विश्लेषण)
| पहलू | फायदे (Benefits) | नुकसान / कमजोरियाँ (Drawbacks / Limitations) |
|---|---|---|
| संरक्षण व स्वायत्तता | आदिवासियों की भाषा, संस्कृति और पारंपरिक स्वशासन (ग्राम सभा/ADC) का कानूनी संरक्षण मिलता है। | व्यावहारिक स्तर पर राज्य नौकरशाही और राजनेता स्वायत्त परिषदों को सीमित बजट और अधिकार देते हैं। |
| भूमि सुरक्षा | गैर-आदिवासी लोगों द्वारा जमीनों की सीधी खरीद-बिक्री पर पूरी तरह रोक। | "राष्ट्रीय हित" और "खनन विकास" के नाम पर सरकार खुद कंपनियों के लिए जमीन अधिग्रहीत कर लेती है। |
| संसाधनों पर अधिकार | जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों की मान्यता (जैसे - लघु वन उपज का अधिकार)। | बड़े खनिज (जैसे सोना, कोयला, बॉक्साइट) राज्य सूची/केंद्र सूची में आते हैं, जिससे आदिवासियों का उन पर नियंत्रण नहीं रह पाता। |
| पारंपरिक न्याय | स्थानीय विवादों का निपटारा पारंपरिक रीति-रिवाजों से बिना अदालत के चक्कर काटे संभव। | कई जगहों पर ग्राम सभाओं के पास शक्तिशाली कॉर्पोरेट्स और प्रशासनिक तंत्र से कानूनी लड़ाई लड़ने के संसाधन नहीं होते। |
निष्कर्ष
पाँचवीं और छठी अनुसूची ने आदिवासियों की पहचान और जमीन की रक्षा के लिए एक मजबूत संवैधानिक ढाल प्रदान की है। हालाँकि, कानून प्रवर्तन एजेंसियों की लाचारी, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, फर्जी ग्राम सभा सहमति और कॉर्पोरेट दबाव के कारण आज भी इन क्षेत्रों में भूमि अतिक्रमण और विस्थापन की समस्या बनी हुई है।
आदिवासियों को उनका वास्तविक अधिकार देने के लिए PESA और अनुसूची के प्रावधानों को बिना किसी प्रशासनिक हेरफेर के सख्ती से लागू करना आवश्यक है।
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