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हेमवती नंदन बहुगुणा (HNB) उत्तराखंड मेडिकल शिक्षा विश्वविद्यालय द्वारा ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए नए स्वास्थ्य पाठ्यक्रम (Health Courses / Diploma) शुरू करने की पहल एक दूरगामी कदम है।
पहाड़ी और दुर्गम ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी एक पुरानी और बड़ी समस्या रही है, जिसके कारण फर्जी डॉक्टरों (Quacks) का जाल और फर्जी प्रमाणपत्रों का कारोबार पनपता है।
इस प्रकार के रोजगारपरक और व्यवहारिक मेडिकल पाठ्यक्रमों के मुख्य लाभ और प्रभाव इस प्रकार हैं:
1. फर्जीवाड़े और बिना प्रैक्टिस के इलाज पर अंकुश
* सत्यापित एवं मानक शिक्षा: अक्सर ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में लोग बिना किसी मान्यता प्राप्त डिग्री या बिना व्यावहारिक अनुभव के इलाज करने लगते हैं। विश्वविद्यालय द्वारा मान्यता प्राप्त कोर्स शुरू होने से युवाओं को सही और वैज्ञानिक चिकित्सा शिक्षा मिलेगी।
* फर्जी प्रमाण पत्रों की रोकथाम: जब स्थानीय स्तर पर ही कम लागत में वैध डिप्लोमा व डिग्री उपलब्ध होगी, तो फर्जी प्रमाणपत्रों (Fake Medical Certificates) के बाजार पर सीधा प्रहार होगा।
2. ग्रामीण क्षेत्रों से बड़े शहरों की ओर पलायन पर रोक
* सुलभ और कम खर्चीली शिक्षा: छोटे कस्बों और गांवों के युवाओं को मेडिकल की पढ़ाई के लिए दिल्ली, देहरादून या अन्य बड़े महानगरों की ओर नहीं भागना पड़ेगा। इससे पढ़ाई पर होने वाला भारी-भरकम खर्च (रहने और फीस का बोझ) काफी कम हो जाएगा।
* स्थानीय स्तर पर सेवाएं: अक्सर बड़े शहरों से एमबीबीएस करने वाले डॉक्टर पहाड़ी या दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में पोस्टिंग नहीं लेना चाहते। स्थानीय युवाओं को ही प्रशिक्षित करने से वे अपने ही क्षेत्र में रहकर काम करने के लिए प्रेरित होंगे।
3. रोजगार और स्वरोजगार (Self-Employment) के अवसर
* प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व वेलनेस सेंटर: इस कोर्स को करने वाले युवा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, या कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर (CHO) के रूप में रोजगार पा सकेंगे।
* खुद का स्वरोजगार: कोर्स पूरा करने के बाद युवा ग्रामीण इलाकों में कानून के दायरे में रहकर 'फर्स्ट ऐड' (प्राथमिक उपचार) केंद्र, पैथोलॉजी सैंपल कलेक्शन सेंटर या हेल्थ वेलनेस क्लिनिक खोलकर अपना रोजगार शुरू कर सकते हैं।
4. पहाड़ी क्षेत्रों में कम खर्चे में तुरंत इलाज
* इमरजेंसी में त्वरित राहत: पहाड़ी इलाकों में मरीज को बड़े अस्पताल तक ले जाने में घंटों लग जाते हैं। प्रशिक्षित पैरामेडिक्स या हेल्थ वर्कर्स होने से मरीज को 'गोल्डन आवर' (शुरुआती महत्वपूर्ण समय) में सही प्राथमिक इलाज मिल सकेगा।
* आम जनता का आर्थिक बचाव: जब गांव/कस्बे के स्तर पर ही सही परामर्श और प्राथमिक इलाज मिलेगा, तो ग्रामीणों को छोटी-मोटी बीमारियों के लिए बड़े शहरों के महंगे निजी अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
सफल कार्यान्वयन के लिए जरूरी सुझाव
* स्पष्ट कार्यक्षेत्र (Scope of Practice): सरकार और विश्वविद्यालय को यह स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होगा कि इस कोर्स को करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ता किन-किन दवाओं और प्राथमिक उपचारों के लिए अधिकृत हैं, ताकि कानूनी भ्रम न फैले।
* प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर जोर: कोर्स में थ्योरी के साथ-साथ जिला अस्पतालों या मेडिकल कॉलेजों में अनिवार्य क्लिनिकल ट्रेनिंग (व्यावहारिक अनुभव) शामिल होनी चाहिए।
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