भारत में शहरी विकास का पूरा ढांचा गाड़ियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, न कि पैदल चलने वालों को।
**समस्या के मुख्य कारण:**
* **अतिक्रमण और बदहाली:** ज्यादातर फुटपाथों पर या तो अवैध कब्जे (दुकानें, गाड़ियां, ठेले) हैं या फिर वे टूटे हुए हैं, जिससे बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं का उन पर चलना नामुमकिन हो जाता है।
* **चौड़ी सड़कें बनाम संकरे फुटपाथ:** गाड़ियाँ आसानी से निकल सकें, इसलिए अक्सर सड़कों को चौड़ा करने के नाम पर फुटपाथ को ही काटकर छोटा कर दिया जाता है या खत्म कर दिया जाता है।
* **मेट्रो वर्सेस छोटे शहर:** मेट्रो शहरों में फिर भी थोड़े-बहुत चलने लायक ट्रैक दिख जाते हैं, लेकिन Tier-2 और Tier-3 शहरों में 'पेडल फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर' की सोच ही गायब है।
**हल क्या होना चाहिए?**
* **सख्त कानून और निगरानी:** सड़क दुर्घटना में पैदल यात्रियों की मौत को रोकने के लिए 'Right to Walk' (चलने का अधिकार) को कानूनी रूप से लागू करने की जरूरत है।
* **डिजाइन में बदलाव:** फुटपाथ पर गड्ढे न हों, रैंप्स हों ताकि बुजुर्ग आसानी से चढ़-उतर सकें और बीच में बैरिकेड्स हों ताकि गाड़ियां उन पर न चढ़ें।
* **स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट:** केवल सीसीटीवी से चालान काटने के बजाय पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित जेब्रा क्रॉसिंग और सिग्नल टाइमिंग पर ध्यान देना जरूरी है।
जब तक भारतीय शहरों का मास्टर प्लान इंसान को केंद्र में रखकर नहीं बनाया जाएगा, तब तक 80 साल के बुजुर्ग हों या आम नागरिक, पैदल चलना एक जोखिम ही बना रहेगा।
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