महासू देवता के मंदिर में चीड़ा जलाने की अनोखी परंपरा ?
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महासू देवता (हनोल, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के जौनसार-बावर क्षेत्र) में चीड़ा (चीड़ की लकड़ी की मशाल) जलाने की अनोखी परंपरा **द्वापर युग के अंत और कलयुग की शुरुआत (पौराणिक मान्यताओं के अनुसार) अथवा 9वीं-12वीं शताब्दी के दौरान** से चली आ रही है।
**परंपरा का इतिहास और पौराणिक संदर्भ**
* **राक्षसों के अंत की खुशी:** पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग के अंत में इस क्षेत्र में किरमिर और कुरोदा नामक राक्षसों का आतंक था। स्थानीय निवासी हूण भाट (ब्राह्मण हुना भट्ट) की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव के रूप में चार महासू भाई (बौठा, बासिक, पबासिक और चालदा) प्रकट हुए। उन्होंने राक्षसों का वध कर क्षेत्र को सुरक्षित किया। इसी विजयोत्सव और अंधकार पर प्रकाश की जीत के प्रतीक रूप में चीड़ा जलाने की प्रथा शुरू हुई।
* **जागड़ा पर्व की परंपरा:** यह अनुष्ठान प्रतिवर्ष भाद्रपद (भादों) महीने में पड़ने वाले प्रसिद्ध **'जागड़ा' पर्व** (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) के अवसर पर आयोजित किया जाता है।
* **धार्मिक मान्यता:** भादों के महीने को अंधकारमय माना जाता है। चीड़ा (देवदार या चीड़ की सूखी लकड़ी की ज्वाला) को जलाकर भक्त बुरी शक्तियों और अंधकार को मिटाने तथा देवता के प्रति अपनी गहरी निष्ठा प्रकट करते हैं।
सदियों पुरानी यह प्रथा आज भी जौनसार-बावर और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में पूरी भव्यता और पारंपरिक लोक-आस्था के साथ निभाई जाती है।
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