खस आदिवासी जनजाति के लोग आज भी कहते हैं उत्तर प्रदेश राजस्थान हरियाणा से आए हैं ?
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खस आदिवासी समुदाय की मौखिक परंपराओं (Oral Traditions), लोकगाथाओं और वंशावलियों में **राजस्थान, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश** के मैदानी इलाकों का ज़िक्र बार-बार आता है।
इतिहासकार और मानवविज्ञानी इस विरोधाभास (मैदानी इलाकों का दावा बनाम वर्तमान हिमालयी निवास) को दो मुख्य चरणों और प्रवासन के इतिहास से समझाते हैं:
**1. द्वितीयक प्रवासन (Secondary Migration):**
आदिकाल में आर्यों/खस समूहों के आगमन के बाद, कई शताब्दियों तक उत्तर भारत के मैदानी इलाकों (राजस्थान, हरियाणा, गंगा-यमुना दोआब) में राजनीतिक उथल-पुथल, युद्ध (जैसे महाभारत काल और उसके बाद के संघर्ष), तथा मध्यकालीन आक्रमण हुए। इन संघर्षों के कारण मैदानी क्षेत्रों से कई क्षत्रिय और कबीलाई समूह (जिन्होंने खुद को खस या राजपूत पहचान से जोड़ा) सुरक्षित स्थानों की तलाश में **हिमालय की पहाड़ियों की ओर पलायन (Migrate)** कर गए।
**2. राजस्थान और मैदानी इलाकों से सांस्कृतिक जुड़ाव:**
* **लोक कथाएं और कुलदेवी/देवता:** उत्तराखंड और नेपाल की खस-राजपूत वंशावलियों में अक्सर लिखा मिलता है कि उनके पूर्वज चित्तौड़गढ़ (राजस्थान), कन्नौज (उत्तर प्रदेश), या थानेसर/कुरुक्षेत्र (हरियाणा) से आए थे।
* **सामाजिक संरचना:** मध्यकाल में मैदानी इलाकों के समृद्ध राज्यों का हिस्सा होना एक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था। इसलिए कई पहाड़ी समूहों ने अपने मैदानी इतिहास और परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा।
**3. दो अलग-अलग दौर का मिश्रण:**
* **पहला दौर (आदिकाल):** प्राचीन खस समूह उत्तर-पश्चिम (मध्य एशिया/हिमालयी दर्रों) से सीधे पहाड़ों में बसे थे।
* **दूसरा दौर (ऐतिहासिक काल):** बाद की शताब्दियों में राजस्थान, हरियाणा और यूपी के मैदानी इलाकों से गए नए आर्य/क्षत्रिय समूह पहले से पहाड़ों में रह रहे खस समूहों में घुल-मिल गए।
इसी वजह से आज के खस बुजुर्ग अपने पूर्वजों का संबंध राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों से बताते हैं। प्राचीन काल का पहाड़ी इतिहास और मध्यकाल का मैदानी प्रवासन—ये दोनों ही बातें अपनी-अपनी जगह सही हैं।
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