शिकारी कैसे बना संत और दुनिया बदल गई ?

शिकारी से संत बनने की जब भी बात आती है, तो भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में सबसे पहला और सबसे भव्य नाम **महर्षि वाल्मीकि** का आता है, जिन्होंने पवित्र ग्रंथ 'रामायण' की रचना की। एक क्रूर शिकारी और डाकू से महान संत बनने की उनकी यह कहानी आत्म-साक्षात्कार, वैराग्य और दृढ़ संकल्प का एक अद्भुत उदाहरण है। आइए जानते हैं कि यह अविश्वसनीय बदलाव कैसे हुआ: ### 1. रत्नाकर: एक क्रूर डाकू और शिकारी महर्षि वाल्मीकि का शुरुआती नाम **रत्नाकर** था। वे जंगलों में रहते थे और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए जंगली जानवरों का शिकार करते थे तथा राहगीरों को लूटते थे। वे बहुत क्रूर थे और लोगों को चोट पहुँचाने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी। ### 2. सप्तऋषियों (या नारद मुनि) से मुलाकात एक दिन रत्नाकर को जंगल में सप्तऋषि (कुछ कथाओं में देवर्षि नारद का उल्लेख है) मिले। रत्नाकर ने उन्हें भी लूटने का प्रयास किया। लेकिन ऋषियों के चेहरे पर कोई डर नहीं था, बल्कि उनके चेहरे पर एक असीम शांति और करुणा थी। ऋषियों ने शांत भाव से रत्नाकर से कहा, "तुम जो चाहो हमसे ले सकते हो, लेकिन पहले हमारे एक सवाल का जवाब दो।" ### 3. वह सवाल जिसने जीवन बदल दिया ऋषियों ने पूछा, "तुम यह जो लूटपाट और जीव-हत्या का घोर पाप कर रहे हो, क्या तुम्हारे परिवार वाले, जिनके लिए तुम यह सब करते हो, तुम्हारे इस पाप में हिस्सेदार बनेंगे?" रत्नाकर ने बड़े गर्व से कहा, "हाँ, क्यों नहीं! मैं यह सब उन्हीं के लिए तो करता हूँ, वे जरूर मेरे पाप का हिस्सा लेंगे।" ऋषियों ने मुस्कुराकर कहा, "एक बार घर जाओ और अपने परिवार के सभी सदस्यों से खुद पूछकर आओ। तब तक हम यहीं तुम्हारा इंतजार करेंगे।" ### 4. सत्य का कड़वा सामना रत्नाकर भागकर अपने घर गए। उन्होंने अपनी पत्नी, माता-पिता और बच्चों को इकट्ठा किया और पूछा, "मैं तुम्हारे पालन-पोषण के लिए जो पाप कर्म करता हूँ, क्या तुम सब मेरे उस पाप का फल भुगतने में मेरे हिस्सेदार बनोगे?" सभी ने एक सुर में साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा, "हमारा भरण-पोषण करना आपका कर्तव्य है, लेकिन आप किस रास्ते से धन लाते हैं, वह आपका निर्णय है। आपके पापों के भागीदार सिर्फ आप ही होंगे, हम नहीं।" यह सुनकर रत्नाकर के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें समझ आ गया कि जिस परिवार के लिए वे इतने पाप कर रहे हैं, अंत समय में वे सब उन्हें अकेला छोड़ देंगे और कर्मों का फल उन्हें अकेले ही भुगतना होगा। ### 5. घोर तपस्या और 'मरा-मरा' का जाप रत्नाकर भागते हुए वापस जंगल में ऋषियों के पैरों में गिर पड़े और रोते हुए अपने पापों का प्रायश्चित करने का उपाय पूछा। ऋषियों ने उनकी व्याकुलता और सच्चे पश्चाताप को देखकर उन्हें राम नाम के जाप की दीक्षा दी। चूँकि रत्नाकर ने जीवन भर सिर्फ हिंसा की थी, इसलिए उनके मुंह से 'राम' शब्द नहीं निकल पा रहा था। तब ऋषियों ने उनसे **"मरा-मरा"** (यानी मरना/मृत्यु) जपने को कहा। जब "मरा-मरा" को लगातार और तेजी से जपा जाता है, तो उसकी ध्वनि अपने आप **"राम-राम"** में बदल जाती है। ### 6. रत्नाकर से 'वाल्मीकि' बनने का सफर रत्नाकर जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठकर आंखें बंद कर तपस्या में लीन हो गए। वे कई वर्षों तक बिना हिले-डुले, भूख-प्यास भूलकर केवल जाप करते रहे। उनकी तपस्या इतनी घोर थी कि उनके शरीर के चारों ओर दीमकों ने अपनी मिट्टी का घर (मिट्टी के ढेर को संस्कृत में **'वाल्मीक'** कहा जाता है) बना लिया। जब उनकी तपस्या पूरी हुई, तो वे उस दीमक की मिट्टी (वाल्मीक) को भेदकर बाहर निकले। मिट्टी से दोबारा जन्म लेने के कारण उनका नाम **'वाल्मीकि'** पड़ा। > **प्रकृति का संदेश:** यह कहानी दर्शाती है कि इंसान का भूतकाल (Past) चाहे कितना भी अंधकारमय क्यों न हो, यदि उसे अपनी गलती का अहसास हो जाए और वह सही रास्ते पर चलने का दृढ़ संकल्प कर ले, तो प्रकृति और ईश्वर उसे अपना लेते हैं। एक शिकारी भी अपनी चेतना को जगाकर 'महर्षि' बन सकता है। >

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