महाभारत काल में भी विभीषण लंका में श्री कृष्ण की लीला का इंतजार कर रहे थे ?

महाभारत के सभा पर्व में इस अद्भुत प्रसंग का बहुत ही सुंदर वर्णन आता है। जब युधिष्ठिर के **राजसूय यज्ञ** के समय सहदेव दक्षिण भारत की विजय यात्रा पर निकले, तो वे समुद्र तट तक पहुँचे। लंकापति विभीषण को जब यह ज्ञात हुआ कि पांडव पांडु-पुत्र हैं और स्वयं **भगवान श्रीकृष्ण** उनके मार्गदर्शक और रक्षक हैं, तो विभीषण का हृदय गदगद हो गया। इस घटना के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: * **श्रीकृष्ण की लीला का स्मरण:** विभीषण त्रेता युग के चिरंजीवी (अमर) हैं। उन्हें भगवान श्रीराम ने लंका का राजा बनाया था और अमरता का वरदान दिया था। जब द्वापर युग आया, तो विभीषण लंका में ही रहकर प्रभु विष्णु के अगले अवतार यानी **श्रीकृष्ण** के अवतरण और उनकी लीलाओं का ध्यान व प्रतीक्षा कर रहे थे। * **सहदेव और विभीषण का संपर्क:** सहदेव जब दक्षिण तट पर पहुँचे, तो उन्होंने विभीषण के पास अपने दूत (कई कथाओं में भीमपुत्र घटोत्कच का उल्लेख आता है) को संदेश देकर भेजा। * **विभीषण का सम्मान और कर-समर्पण:** विभीषण ने पांडवों को श्रीकृष्ण का अति प्रिय माना। उन्होंने न केवल सहदेव के दूतों का बहुत आदर-सत्कार किया, बल्कि युधिष्ठिर को चक्रवर्ती सम्राट स्वीकार करते हुए राजसूय यज्ञ के लिए अनेक अमूल्य रत्न, स्वर्ण, मणियाँ और दिव्य वस्त्र सहदेव के माध्यम से भिजवाए। यह प्रसंग दिखाता है कि त्रेता युग के रामभक्त विभीषण ने द्वापर युग में श्रीकृष्ण की सत्ता और पांडवों के धर्म-राज्य को पूर्ण सम्मान दिया।

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