बेरोजगारी से उठे संकट देश में बेरोजगार आंदोलन यह महत्वपूर्ण कड़ियां है डिग्रियों की संख्या बढ़ाने की होड़ ?

डिग्रियों की बढ़ती संख्या, घटती शिक्षा गुणवत्ता, और कौशल (Skill) का अभाव—यह एक ऐसा त्रिकोण है जिसने न केवल भारत बल्कि वैश्विक स्तर पर युवाओं के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। हाल के वर्षों में भारत में विभिन्न राज्यों में हुए युवाओं के प्रदर्शनों से लेकर बांग्लादेश, केन्या और अन्य देशों में 'जेन-जी' (Gen Z) के सड़कों पर उतरने तक, बेरोजगारी अब केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक **सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन** का रूप ले चुकी है। ## 1. डिग्रियों की दौड़ बनाम वास्तविक कौशल: संकट की जड़ बीते कुछ दशकों में देश में कॉलेज, यूनिवर्सिटी और डिग्रियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, लेकिन इसने **'डिग्री-मुद्रास्फीति' (Degree Inflation)** को जन्म दिया: * **डिग्री का होना, रोजगार की गारंटी नहीं:** लाखों युवा इंजीनियरिंग, आर्ट्स या मैनेजमेंट की डिग्रियां लेकर निकल रहे हैं, लेकिन उद्योगों (Industries) की मांग और छात्रों की योग्यता के बीच बड़ा अंतर (Skill Gap) है। * **शिक्षा का व्यवसायीकरण:** गुणवत्तापूर्ण शोध और व्यावहारिक प्रशिक्षण की जगह केवल परीक्षा पास करवाकर सर्टिफिकेट बांटने की होड़ लग गई। * **अंडर-एंप्लॉयमेंट (Underemployment):** चपरासी या क्लर्क के पदों के लिए पीएचडी और एम.टेक/बी.टेक पास युवाओं के आवेदन करना इस बात का सबूत है कि हमारी शिक्षा प्रणाली कौशल से ज्यादा कागजी योग्यता पर टिकी है। ## 2. भारत में 'रोजगार आंदोलन' का स्वरूप भारत में युवाओं का सब्र टूटने का असर पिछले कुछ वर्षों में रेलवे, रक्षा सेवाओं (जैसे अग्निपथ योजना के समय), और राज्य लोक सेवा आयोगों (जैसे UPPSC, BPSC आदि) की परीक्षाओं में अनियमिताओं और देरी को लेकर हुए उग्र आंदोलनों में दिखा है। * **पारदर्शिता और प्रणालीगत देरी:** समय पर नौकरियां न निकलना, पेपर लीक होना, और सालों-साल भर्तियां कोर्ट में अटकी रहना युवाओं के मानसिक तनाव और आक्रोश की सबसे बड़ी वजह है। * **संगठित बनाम असंगठित क्षेत्र:** निजी क्षेत्र में अच्छे वेतन वाली नौकरियों की कमी के कारण युवा सरकारी नौकरियों के पीछे भागने को मजबूर हैं, जहां प्रतिस्पर्धा असंतुलित हो चुकी है। ## 3. वैश्विक परिदृश्य: 'जेन-जी' का आक्रोश यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी (Gen Z) पारंपरिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने में संकोच नहीं कर रही है: | देश/क्षेत्र | आंदोलन का मुख्य कारण | Gen Z की भूमिका | |---|---|---| | **बांग्लादेश** | सरकारी नौकरियों में कोटा और बेरोजगारी | छात्रों/युवाओं का ऐतिहासिक आंदोलन जिसने सत्ता परिवर्तन तक कर दिया। | | **केन्या** | टैक्स वृद्धि, आर्थिक तंगी और रोजगार का अभाव | Gen Z ने सोशल मीडिया के जरिए बिना किसी नेता के स्वतःस्फूर्त (Spontaneous) बड़ा प्रदर्शन खड़ा किया। | | **यूरोप/अमेरिका** | मंदी की आहट, एआई (AI) का डर और रहन-सहन की लागत (Cost of Living) | युवाओं द्वारा 'Right to Work' और बेहतर न्यूनतम वेतन को लेकर प्रदर्शन। | > **जेन-जी का दृष्टिकोण अलग क्यों है?** > यह पीढ़ी डिजिटल रूप से जुड़ी हुई है। ये सरकार के खोखले वादों को तुरंत पकड़ लेते हैं और सोशल मीडिया (X, इंस्टाग्राम) का उपयोग करके मिनटों में देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने की क्षमता रखते हैं। > ## 4. समाधान: कागज की डिग्री से 'कौशल और रोजगार' की ओर इस संकट को टालने के लिए केवल नई भर्तियों का विज्ञापन जारी करना काफी नहीं है; इसके लिए ढांचागत (Structural) सुधार जरूरी हैं: 1. **शिक्षा नीति का व्यावहारिक क्रियान्वयन:** राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत स्कूल और कॉलेज स्तर से ही **व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education)** को अनिवार्य बनाना। 2. **उद्योग और अकादमी (Industry-Academia) का मेल:** सिलेबस को हर साल आधुनिक तकनीकों (AI, डेटा साइंस, ऑटोमेशन) के हिसाब से अपडेट किया जाए ताकि डिग्री पूरी होते ही छात्र 'Job-Ready' हों। 3. **पारदर्शी और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया:** सरकारी भर्ती परीक्षाओं के लिए एक सख्त कैलेंडर (National Exam Calendar) और पेपर-लीक रोधी कड़े कानून को सख्ती से लागू करना। 4. **उद्यमिता (Entrepreneurship) को बढ़ावा:** केवल 'नौकरी मांगने वाले' बनाने के बजाय स्थानीय स्तर पर MSMEs और स्टार्टअप्स को समर्थन देकर 'नौकरी देने वाले' बनने के अवसर बनाना।

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