भारतीय अर्थव्यवस्था भू राजनीतिक तनाव के बीच आर्थिक सुरक्षा की नई धुरी बनती जा रही है ?

वैश्विक स्तर पर जारी तनाव, युद्ध (जैसे यूरोप और मध्य पूर्व के संघर्ष), आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) में व्यवधान और बढ़ते संरक्षणवाद के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था केवल खुद को संभाल ही नहीं रही है, बल्कि दुनिया के लिए **'आर्थिक सुरक्षा और स्थिरता की एक नई धुरी'** बनकर उभर रही है। जहाँ एक ओर विकसित अर्थव्यवस्थाएँ मंदी, मुद्रास्फीति और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही हैं, वहीं भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) और मजबूत घरेलू आर्थिक बुनियादी ढाँचे (Economic Fundamentals) के बल पर वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच संतुलन बनाने में सफल रहा है। ## 1. आर्थिक सुरक्षा की धुरी बनने के मुख्य कारण ### 1. 'चीन + 1' (China + 1) रणनीति का मुख्य केंद्र दुनिया की बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियाँ अब निर्माण और आपूर्ति के लिए सिर्फ चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। भारत का **PLI (Production Linked Incentive)** ढाँचा और विशाल घरेलू बाज़ार सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल क्षेत्रों में वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। ### 2. ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता पश्चिम एशिया और पूर्वी यूरोप के तनाव के बीच भारत ने किसी गुट में शामिल होने के बजाय **राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा** को प्राथमिकता दी। रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात कर भारत ने घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति (Inflation) को अनियंत्रित होने से बचाया और अपनी व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखी। ### 3. डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure - DPI) भारत का UPI, आधार, ONDC और कोविन (CoWIN) जैसा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुका है। यह तकनीक न केवल वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ावा दे रही है, बल्कि किसी भी वैश्विक संकट के समय सीधी आर्थिक मदद पारदर्शी तरीके से जनता तक पहुँचाने में सक्षम बनाती है। ### 4. वैकल्पिक व्यापार गलियारे (Alternative Trade Routes) लाल सागर और समुद्री चोकपॉइंट्स (Chokepoints) में बढ़ते तनाव को देखते हुए भारत वैकल्पिक आर्थिक मार्गों के निर्माण में मुख्य भूमिका निभा रहा है: * **IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा)** * **INSTC (अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा)** * **फ्रेंड-शोरिंग (Friend-shoring):** मित्र देशों के साथ मिलकर सुरक्षित आपूर्ति शृंखला का निर्माण। ## 2. भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियाँ हालांकि भारत वैश्विक आर्थिक सुरक्षा का स्तंभ बन रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं का असर पूरी तरह से बेअसर नहीं है: | चुनौती | प्रभाव | |---|---| | **कच्चे तेल पर निर्भरता** | भारत अपनी आवश्यकता का ~85% तेल आयात करता है, जिससे बाह्य मूल्य आघात का जोखिम बना रहता है। | | **मुद्रा और व्यापार घाटा** | वैश्विक अनिश्चितता के समय डॉलर की मजबूती से रुपये पर दबाव और चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ने का खतरा रहता है। | | **निर्यात में सुस्ती** | अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख वैश्विक बाजारों में माँग सुस्त होने से भारतीय निर्यात प्रभावित होता है। | ## 3. भावी दिशा (Way Forward) 1. **ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition):** 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) के लक्ष्यों में तेजी लाकर ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करना। 2. **घरेलू विनिर्माण की गहराई:** स्पेयर पार्ट्स और कच्चे माल के स्थानीय उत्पादन (Component Manufacturing) को मजबूत करना ताकि बाहरी झटकों का असर कम से कम हो। 3. **दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation):** 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की आवाज बनकर विकासशील देशों के लिए खाद्य और ईंधन सुरक्षा सुनिश्चित करने में नेतृत्व प्रदान करना। > **निष्कर्ष:** भू-राजनीतिक उथल-पुथल के इस दौर में, भारत का दृष्टिकोण केवल 'रक्षात्मक' नहीं है; बल्कि भारत एक ऐसा 'सकारात्मक गुटनिरपेक्ष और आर्थिक सुरक्षा केंद्र' बन रहा है, जो वैश्विक आपूर्ति शृंखला को टूटने से बचाने में अहम भूमिका निभा रहा है। >

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