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भारतीय इतिहास में "खत्तिय उपाधि" जातियों के आने से पहले दी जाती थी लेकिन "खस उपाधि" किसे दी जाती थी भारत में आर्यन के आने के बाद ?
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आर्यों के आगमन और वैदिक काल के बाद प्राचीन भारतीय साहित्य (जैसे महाभारत, मनुस्मृति, पुराण और काव्य ग्रंथों) में **'खस' (Khasa / Khaśa)** शब्द किसी व्यक्ति विशेष की उपाधि के स्थान पर **एक विशिष्ट जनसमूह, जनजाति या क्षेत्रीय पहचान** के रूप में प्रयोग किया जाता था।
इतिहासकारों और प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अनुसार 'खस' संदर्भ की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
## 1. पर्वतीय/हिमालयी योद्धा जनजाति की पहचान
* **भौगोलिक क्षेत्र:** आर्यों के प्रसार के दौरान और उनके बाद, मध्य एशिया और उत्तर-पश्चिम से आकर **हिमालयी क्षेत्रों** (वर्तमान कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल) में बसने वाले योद्धा वर्ग को **'खस'** कहा गया।
* **युद्ध कौशल:** 'महाभारत' में खस लोगों का उल्लेख एक पराक्रमी पहाड़ी योद्धा जनजाति के रूप में मिलता है, जिन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में भाग लिया था।
## 2. 'ब्रात्य क्षत्रिय' या 'पतित क्षत्रिय' का दर्जा
वैदिक वैदिक/आर्य समाज की वर्ण-व्यवस्था में खस समाज को विशेष स्थान दिया गया:
* **वैदिक कर्मकांड न मानना:** मनुस्मृति (अध्याय 10) और पुराणों के अनुसार, खस भी मूल रूप से क्षत्रिय/आर्य मूल के थे, लेकिन वैदिक रीति-रिवाजों और कर्मकांडों का पालन न करने के कारण उन्हें **'ब्रात्य क्षत्रिय'** (आचार-भ्रष्ट या पतित क्षत्रिय) कहा गया।
* **स्वतंत्र समाज:** यह वर्ग वैदिक ब्राह्मणवादी नियंत्रण से बाहर रहकर अपनी अलग परंपराओं, प्रकृति पूजा और स्थानीय देवी-देवताओं (जैसे मस्टो पूजा) का पालन करता था।
## 3. मध्यकाल में 'क्षत्रिय' और 'क्षेत्री' पहचान में परिवर्तन
समय के साथ जब ये खस राजा और समुदाय उत्तर भारत के मुख्यधारा समाज में एकीकृत हुए:
* हिमालयी क्षेत्रों (विशेषकर नेपाल और उत्तराखंड) में शासन करने वाले खस राजाओं ने खुद को **क्षत्रिय/छेत्री (Chhetri)** स्वीकार किया।
* आज नेपाल और भारत के कुमाऊं-गढ़वाल में रहने वाले **नेगी, बिष्ट, रावल, खड़का, भंडारी** आदि कई क्षत्रिय उपनाम इन्हीं प्राचीन 'खस' राजवंशों और योद्धाओं के वंशज माने जाते हैं।
## संक्षेप में
जहां **'खत्तिय'** (क्षत्रिय) बौद्ध/पाली काल में **भूमि-रक्षक और शासक वर्ग** की पहचान थी, वहीं **'खस'** उत्तर-पश्चिम और हिमालयी क्षेत्र की एक ऐसी **पहाड़ी योद्धा जनजाति/वर्ग** को दी गई संज्ञा थी जो आर्य संस्कृति के प्रभाव में तो आई, लेकिन अपने स्वतंत्र आचार-विचार के कारण वैदिक समाज द्वारा 'भिन्न/ब्रात्य क्षत्रिय' मानी गई।
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