देश के सर्वाधिक उन्नत शहरों में करीब 69 फीसदी महिलाएं घरेलू कामकाज के चलते श्रम बल से बाहर है क्या कहता है सो के ताजा सर्वे ?

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा देश के 46 सबसे बड़े शहरों (Million-Plus Cities) पर किया गया यह सर्वेक्षण वाकई देश को चौंकाने वाला और एक बड़े विरोधाभास (Paradox) को सामने लाने वाला है। जहां एक तरफ देश आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर है और समृद्धि बढ़ रही है, वहीं सबसे आधुनिक शहरों में **69% महिलाओं का सिर्फ घरेलू काम-काज और बच्चों की देखभाल (Childcare and Housework) के कारण श्रम बल (Labour Force) से बाहर होना** एक गंभीर चिंता का विषय है। इसके मुकाबले सिर्फ 1% पुरुषों ने घरेलू काम को श्रम बल से बाहर रहने का कारण बताया, जो समाज में "केयर वर्क" (Unpaid Care Work) के भारी लैंगिक असंतुलन को दर्शाता है। इस सर्वे के आंकड़ों और इसके पीछे के मुख्य कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है: ### 1. आर्थिक समृद्धि के बीच यह 'हैरान करने वाला आंकड़ा' क्यों? आमतौर पर माना जाता है कि शहरों में पढ़ाई-लिखाई और नौकरियों के अवसर ज्यादा होते हैं, तो महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी। लेकिन बड़े शहरों में तीन मुख्य कारणों से ऐसा नहीं हो पा रहा है: * **'सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर और चाइल्डकेयर' की कमी:** बड़े शहरों में न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) का चलन है। बच्चों को संभालने के लिए दादा-दादी या संयुक्त परिवार का सहारा नहीं होता। भरोसेमंद और किफायती डे-केयर या क्रेश (Creche) की कमी के कारण महिलाओं को मजबूरी में नौकरी छोड़नी पड़ती है। * **लंबा ट्रैवल टाइम और काम के घंटे:** मेट्रो शहरों में दफ्तर आने-जाने (Commute) में 2 से 3 घंटे लग जाते हैं और काम के घंटे भी करीब 49 घंटे प्रति सप्ताह हैं। इसके साथ घर की जिम्मेदारी संभालना शारीरिक और मानसिक रूप से लगभग असंभव हो जाता है। * **आय में असमानता (Gender Wage Gap):** इसी सर्वे के अनुसार, बड़े शहरों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को औसतन **23% कम वेतन** मिलता है (पुरुषों का औसत वेतन ₹30,700 तो महिलाओं का ₹23,700 है)। कम वेतन के चलते कई बार परिवार को लगता है कि महिला का नौकरी करने से ज्यादा घर संभालना आर्थिक रूप से "फायदेमंद" है। ### 2. शहरों के बीच का बड़ा अंतर (City-wise Trends) सर्वे दिखाता है कि देश के सभी उन्नत शहरों की स्थिति एक जैसी नहीं है, कुछ शहरों में यह रूढ़िवादिता बहुत ज्यादा गहरी है: * **सबसे खराब स्थिति:** हावड़ा (83%), सूरत (81%), पिंपरी-चिंचवाड़ और भोपाल (78%) जैसे शहरों में लगभग 80% या उससे ज्यादा महिलाएं घरेलू काम के कारण घर पर बैठने को मजबूर हैं। * **बेहतर स्थिति:** कोयंबटूर (38%) और आगरा (41%) जैसे शहरों में यह आंकड़ा काफी कम है, यानी यहाँ अधिक महिलाएं काम कर पा रही हैं। ### 3. देश के विकास (Viksit Bharat) पर इसका क्या असर होगा? * **डेमोग्राफिक डिविडेंड का नुकसान:** भारत अपनी युवा आबादी के दम पर "विकसित भारत" बनने का सपना देख रहा है। लेकिन अगर देश की आधी आबादी (महिलाएं) देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सीधे योगदान नहीं दे पाएगी, तो आर्थिक तरक्की की रफ्तार आधी रह जाएगी। * **बिना भुगतान वाला श्रम (Unpaid Labor):** महिलाएं घर पर जो खाना बनाने, सफाई और बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं, वह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तो है, लेकिन उसे GDP या नेशनल इनकम में गिना नहीं जाता। इसे "अदृश्य काम" (Invisible Work) कहा जाता है। ### आगे का रास्ता क्या है? अगर देश को सचमुच समृद्ध होना है, तो सिर्फ फैक्ट्रियां और दफ्तर खोलना काफी नहीं होगा। कॉर्पोरेट और सरकार को मिलकर **समान वेतन, मैटरनिटी लीव के बाद सुरक्षित क्रेश (Childcare) की व्यवस्था, वर्क फ्रॉम होम (Work from Home) के विकल्प और सुरक्षित पब्लिक ट्रांसपोर्ट** जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं करनी होंगी। क्या आपको लगता है कि हमारे समाज में आज भी कामकाजी महिलाओं के प्रति सोच उतनी नहीं बदली है जितनी आर्थिक तरक्की बदली है?

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