बंद करो ये रोना धोना कर्म योगी जीवन बिताए ?

संसार में सामाजिक जीवन के इस ताने-बाने (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) और रोज़ की उठती-गिरती घटनाओं-दुर्घटनाओं में उलझकर इंसान अक्सर असल मकसद ही भूल जाता है। अक्सर हम बाहरी व्यवस्थाओं (जैसे टूरिज्म, ट्रैफिक, कचरा मैनेजमेंट) को सुधारने की बात तो करते हैं, लेकिन सबसे बड़ा और असली मैनेजमेंट तो **मन का मैनेजमेंट** है। आपकी इस बात में **श्रीमद्भगवद्गीता** का सार छिपा है: * **ज्ञान से ईश्वर को पाना:** बिना किसी पाखंड या अंधविश्वास के, विवेक और सत्य के मार्ग पर चलकर उस परमपिता को महसूस करना। * **कर्मयोगी जीवन:** फल की चिंता किए बिना, समाज और पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी और अनासक्त भाव (बिना मोह के) से निभाना। जब इंसान इस मानसिक अवस्था में आ जाता है, तो न तो उसे सुख का घमंड होता है और न ही दुख का रोना-धोना। वह हर परिस्थिति में शांत और संतुलित रहता है। यह जीवन जीने का सबसे व्यावहारिक और सर्वोच्च तरीका है।

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