भारत में पांच मेट्रो सिटी आग बढ़ने की घटना 2019 से और कितने लोगों की मृत्यु हुई लोग फायर एनओसी क्यों नहीं ले पाते हैं ? ?

भारत के बड़े महानगरों (मेट्रो सिटीज) में आग लगने की घटनाएं और उनमें होने वाली मौतें एक बेहद गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) और विभिन्न राज्यों के अग्निशमन विभागों (Fire Departments) के आंकड़ों के विश्लेषण से इससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आती हैं: ## 1. 2019 से मेट्रो शहरों में आग की घटनाएं और मौतें भारत के पांच प्रमुख मेट्रो शहरों (**दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और चेन्नई**) में 2019 के बाद से आग लगने की घटनाओं में इजाफा देखा गया है, विशेषकर गर्मियों के महीनों में। * **घटनाओं में वृद्धि:** आंकड़ों के अनुसार, देश में हर साल औसतन **9,000 से 11,000** के बीच आग लगने की छोटी-बड़ी घटनाएं दर्ज की जाती हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहरों में यह संख्या सबसे अधिक है। (उदाहरण के लिए, केवल दिल्ली में ही गर्मियों के शुरुआती महीनों में हर महीने 1,500 से 2,500 से अधिक आग के कॉल रिकॉर्ड किए जाते हैं)। * **मृत्यु के आंकड़े:** 2019 के बाद से देश में आग की घटनाओं के कारण सालाना लगभग **6,000 से 9,000 लोगों की मृत्यु** (सभी क्षेत्रों को मिलाकर) होती है। मेट्रो शहरों की बात करें, तो संकरी गलियों और अवैध निर्माणों के कारण यहां मृत्यु दर अधिक रहती है। बीते वर्षों में मुंडका अग्निकांड (27 मौतें), अनाज मंडी (44 मौतें), और हाल ही में मालवीय नगर या गेमिंग ज़ोन जैसी बड़ी त्रासदियों ने इन आंकड़ों को और भयावह बना दिया है। * **मुख्य कारण:** भीषण गर्मी, बिजली के लोड के कारण **शॉर्ट सर्किट**, पुरानी और जर्जर वायरिंग, और कमर्शियल इमारतों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी। ## 2. लोग फायर NOC (No Objection Certificate) क्यों नहीं ले पाते? अग्निशमन विभाग से **फायर एनओसी** लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है, फिर भी मेट्रो शहरों में 60% से अधिक व्यावसायिक इमारतें, छोटे होटल, कोचिंग सेंटर और फैक्ट्रियां बिना एनओसी के चल रही हैं। इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं: ### क) बुनियादी ढांचे और नियमों की जटिलता * **संकरी गलियां और अवैध निर्माण:** मेट्रो शहरों के कई व्यापारिक इलाके (जैसे दिल्ली का सदर बाजार, चांदनी चौक या मुंबई की चालें) बेहद संकरी गलियों में हैं। नियमों के मुताबिक, फायर एनओसी के लिए इमारत के पास कम से कम 6 मीटर चौड़ी सड़क होनी चाहिए ताकि दमकल की गाड़ी आ सके। पुरानी या अवैध रूप से बनी इमारतें इस शर्त को कभी पूरा ही नहीं कर पातीं। * **निकास द्वार (Exit Points) की कमी:** फायर सेफ्टी गाइडलाइंस के अनुसार, इमारतों में कम से कम दो आपातकालीन निकास (Emergency Exits) होने चाहिए। लेकिन अधिकांश बिल्डर या मालिक ज्यादा जगह के लालच में एक ही सीढ़ी या रास्ता बनाते हैं। ### ख) प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक कमियां * **लंबी और जटिल प्रक्रिया:** पहले फायर एनओसी प्राप्त करने की प्रक्रिया बहुत थकाऊ और समय लेने वाली थी। हालांकि, अब दिल्ली जैसे शहरों में प्राइवेट एक्सपर्ट्स को शामिल करके इसे आसान बनाने की कोशिश (जैसे दिल्ली फायर सेफ्टी रूल्स) की जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी विभागों में मैनपावर की कमी के कारण आवेदनों पर फैसला होने में महीनों लग जाते हैं। * **भ्रष्टाचार और ढिलाई:** कई बार बिल्डिंग मालिक एनओसी के कड़े नियमों को पूरा करने पर पैसा खर्च करने के बजाय, स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत या रिश्वत के दम पर बिना एनओसी के ही सालों-साल धड़ल्ले से अपना काम चलाते रहते हैं। ### ग) वित्तीय और जागरूकता का अभाव * **अग्निशमन उपकरणों का भारी खर्च:** इमारतों में फायर स्प्रिंकलर, अलार्म सिस्टम, वॉटर होज और बड़े वाटर टैंक स्थापित करने में लाखों रुपये का खर्च आता है। छोटे व्यापारी या कारखाना मालिक इस वित्तीय बोझ से बचने के लिए एनओसी के लिए आवेदन ही नहीं करते। * **अवेयरनेस की कमी:** आम जनता और छोटे दुकानदारों में यह गलत धारणा है कि "आग लगने की घटना उनके यहाँ नहीं होगी।" सुरक्षा को प्राथमिकता न देकर वे केवल कागजी कार्रवाई से बचने की कोशिश करते हैं। > **निष्कर्ष:** मेट्रो शहरों को सुरक्षित बनाने के लिए केवल कड़े नियम बनाना काफी नहीं है, बल्कि 'फायर एनओसी' की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी (डिजिटल) बनाना और नियमों का उल्लंघन करने वाली अवैध इमारतों पर तुरंत सीलिंग की कार्रवाई करना बेहद जरूरी है।

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