लखनऊ में कोचिंग संस्थान में लगी आग से उठे सवाल देश के कई राज्यों में कोचिंग संस्थान बिना सुरक्षा मानकों के चल रहे हैं ?

लखनऊ के अलीगंज में एक कमर्शियल बिल्डिंग में लगी भीषण आग (जिसमें 15 मासूम लोगों और छात्रों की जान चली गई) ने एक बार फिर देश के कोचिंग सेंटरों और कमर्शियल बिल्डिंग्स में सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाए जाने की कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है। यह कोई पहली घटना नहीं है। दिल्ली के मुखर्जी नगर, सूरत के तक्षशिला कॉम्प्लेक्स और कोटा की घटनाएं इस बात का गवाह हैं कि देश के कई राज्यों में कोचिंग संस्थान बिना पुख्ता सुरक्षा मानकों के धड़ल्ले से चल रहे हैं। लखनऊ हादसे के बाद कुछ बेहद गंभीर सवाल खड़े हुए हैं: ### 1. बेसमेंट और रिहायशी इलाकों का अवैध व्यावसायिक इस्तेमाल नियमों के मुताबिक, जिन ढांचों को रहने या सामान्य ऑफिस के लिए पास कराया जाता है, उनमें हजारों बच्चों की क्षमता वाले कोचिंग सेंटर खोल दिए जाते हैं। लखनऊ हादसे के बाद ही उत्तर प्रदेश सरकार ने **बेसमेंट में कोचिंग और व्यावसायिक गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध** लगा दिया है। जांच में सामने आया कि जिस बिल्डिंग में आग लगी, उसका नक्शा कुछ और था और वहां काम कुछ और हो रहा था। ### 2. 'अग्निशमन अनापत्ति प्रमाण पत्र' (Fire NOC) का न होना देश के अधिकांश कोचिंग संस्थानों के पास या तो 'फायर एनओसी' होती ही नहीं, या वे पुराने हो चुके सर्टिफिकेट्स पर काम चला रहे होते हैं। आग बुझाने वाले सिलेंडर (Fire Extinguishers) केवल दिखावे के लिए टांग दिए जाते हैं, जिनमें से आधे एक्सपायर्ड होते हैं या वहां के स्टाफ को उन्हें चलाना तक नहीं आता। ### 3. निकास द्वार (Exit Gates) की कमी और संकरी सीढ़ियां कोचिंग सेंटरों में एक ही समय पर सैकड़ों छात्र मौजूद होते हैं। यदि कोई आपातकालीन स्थिति (जैसे शॉर्ट सर्किट या आग) बनती है, तो भागने के लिए केवल एक संकरी सीढ़ी होती है। लखनऊ हादसे में भी ऑटोमैटिक सेंसर वाले गेट फेल हो गए और चारों तरफ धुआं फैलने से ज्यादातर मौतें दम घुटने के कारण हुईं। छात्रों को जान बचाने के लिए पहली और दूसरी मंजिल से कूदना पड़ा। ### 4. प्रशासनिक लापरवाही: 'हादसे के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम?' जैसे ही लखनऊ में यह दर्दनाक हादसा हुआ, प्रशासन तुरंत एक्शन में आया—4 अफसरों को सस्पेंड किया गया, एसआईटी (SIT) जांच बैठाई गई, और कानपुर से लेकर जयपुर तक दर्जनों कोचिंग सेंटरों को आनन-फानन में सील कर दिया गया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि **प्रशासन इन अवैध और असुरक्षित संस्थानों के खिलाफ नियमित रूप से ऑडिट क्यों नहीं करता?** क्या कार्रवाई करने के लिए किसी बड़े हादसे और मासूमों की मौत का इंतजार किया जाता है? ### अब आगे क्या होना चाहिए? * **कड़ा कानून और रेगुलर ऑडिट:** हर 6 महीने में फायर और बिल्डिंग सेफ्टी का औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) अनिवार्य होना चाहिए। * **छात्रों और स्टाफ की ट्रेनिंग:** हर संस्थान में महीने में एक बार 'फायर मॉक ड्रिल' होनी चाहिए ताकि बच्चों को पता हो कि आपातकाल में कैसे बाहर निकलना है। * **जवाबदेही तय हो:** केवल बिल्डिंग मालिक या कोचिंग संचालक ही नहीं, बल्कि उस इलाके के उन सरकारी अधिकारियों पर भी गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा चलना चाहिए जिन्होंने रिश्वत लेकर या लापरवाही बरतकर ऐसी असुरक्षित इमारतों को चलने की अनुमति दी। > **एक नागरिक के नाते:** यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य किसी कोचिंग संस्थान में पढ़ रहा है, तो दाखिला लेने से पहले वहां के **Emergency Exit (आपातकालीन निकास)** और **Fire Safety** व्यवस्था की जांच जरूर करें। जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है। >

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