भारत दुनिया का दवाखाना है लेकिन शोध में काली खान है ?

भारत को **"दुनिया का दवाखाना" (Pharmacy of the World)** इसलिए कहा जाता है क्योंकि हम दुनिया भर में सबसे ज़्यादा जेनेरिक दवाएं (Generic Medicines) और वैक्सीन सप्लाई करते हैं। लेकिन जब बात **मौलिक शोध (Original Research)**, नई दवाओं की खोज (Discovery) और नोबेल पुरस्कारों की आती है, तो हमारा हाथ वाकई बहुत तंग रहा है। चिकित्सा (Medicine) के क्षेत्र में आखिरी नोबेल पुरस्कार 1968 में डॉ. हरगोविंद खुराना को मिला था, और वे भी अमेरिकी नागरिक बन चुके थे। भारत इस "शोध की काली खान" या सूखे से क्यों जूझ रहा है? इसके पीछे कुछ बेहद मुख्य और बुनियादी कारण हैं: ### 1. 'खोज' बनाम 'कॉपी' (Reverse Engineering) भारत की दवा कंपनियां **जेनेरिक दवाएं** बनाने में माहिर हैं। जेनेरिक का मतलब है कि किसी दूसरे देश (जैसे अमेरिका या यूरोप) ने अरबों डॉलर खर्च करके एक नई दवा खोजी। जब उस दवा का पेटेंट (10-20 साल बाद) खत्म हो गया, तो भारतीय कंपनियों ने उसके फॉर्मूले को समझकर सस्ते में बनाना शुरू कर दिया। * **नतीजा:** इससे व्यापार तो बढ़ा और दवाएं सस्ती हुईं, लेकिन खुद की कोई नई दवा ईजाद नहीं हुई। ### 2. रिसर्च बजट में भारी कमी (Low R&D Spending) नोबेल प्राइज जीतने वाले देशों (अमेरिका, चीन, जापान) की सफलता के पीछे उनका भारी-भरकम बजट होता है। * **भारत:** अपनी जीडीपी (GDP) का मात्र **0.6% से 0.7%** रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च करता है। * **अन्य देश:** अमेरिका लगभग 3.5%, दक्षिण कोरिया 4.8%, और चीन 2.4% से ज़्यादा खर्च करते हैं। * दवा बनाने की रिसर्च (Drug Discovery) में एक-एक मॉलिक्यूल पर 10-12 साल का समय और अरबों रुपये लगते हैं, और सफलता की गारंटी भी नहीं होती। भारतीय कंपनियां इतना बड़ा रिस्क लेने से बचती हैं। ### 3. रट्टा मार शिक्षा प्रणाली और 'ब्रेन ड्रेन' (Brain Drain) हमारे यहाँ मेडिकल और एजुकेशन सिस्टम आज भी थ्योरी और क्लिनिकल प्रैक्टिस पर ज़्यादा ज़ोर देता है, न कि रिसर्च पर। * डॉक्टर बनने के बाद युवाओं का पूरा ध्यान मरीज़ देखने और पैसे कमाने (प्राइवेट प्रैक्टिस या बड़े अस्पतालों में नौकरी) पर होता है। * जो मुट्ठी भर लोग रिसर्च करना भी चाहते हैं, उन्हें भारत में वैसी एडवांस लैब्स और फंडिंग नहीं मिलती। नतीजतन, वे अमेरिका या यूरोप चले जाते हैं और वहां जाकर बड़े आविष्कार करते हैं। ### 4. अस्पतालों की भीड़ और डॉक्टरों पर काम का बोझ भारत के सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टरों पर मरीज़ों का इतना भारी दबाव है कि उनके पास सांस लेने की फुर्सत नहीं होती। > **एक कड़वा सच:** जिस डॉक्टर को रोज़ 200 मरीज़ देखने पड़ रहे हों, वह लैब में बैठकर नई रिसर्च कैसे करेगा? रिसर्च के लिए शांत दिमाग, समय और संसाधनों की ज़रूरत होती है, जो हमारे डॉक्टरों के पास नहीं है। > ### क्या स्थिति बदल रही है? पिछले कुछ सालों में इस कमी को समझा गया है: * **वैक्सीन में आत्मनिर्भरता:** कोविड-19 के दौरान 'कोवैक्सीन' (Covaxin) जैसी स्वदेशी वैक्सीन बनाकर भारत ने दिखाया कि क्षमता है। * **अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (Anusandhan NRF):** सरकार ने रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए नए फंड और नीतियां बनाना शुरू किया है ताकि यूनिवर्सिटीज में शोध का माहौल बने। **निष्कर्ष:** भारत के पास डॉक्टरों की कमी नहीं है, न ही दिमाग की कमी है। कमी है तो बस **सही माहौल, भारी-भरकम फंडिंग और रिस्क लेने की क्षमता** की। जब तक हम 'सस्ता बनाने' की मानसिकता से ऊपर उठकर 'नया बनाने' पर पैसा और समय नहीं लगाएंगे, तब तक नोबेल प्राइज की लिस्ट में हमारा सूखा खत्म होना मुश्किल है।

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