भारत की आजादी से पहले सोना कितना था और आजादी के बाद अंग्रेजों ने उसे सोने को कैसे खर्चे में दिखाया ?
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भारत की आजादी के समय देश के सोने और खजाने को लेकर इतिहास में कई वित्तीय और राजनीतिक पहलू रहे हैं। यह सच है कि अंग्रेजों ने सदियों तक भारत का आर्थिक शोषण किया, जिसे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ड्रेन ऑफ वेल्थ (Drain of Wealth) सिद्धांत कहते हैं।
आइए इसे आसान शब्दों में समझते हैं कि आजादी के वक्त क्या स्थिति थी और अंग्रेजों ने इसे कागजों पर कैसे दिखाया:
### 1. आजादी से पहले भारत के पास कितना सोना था?
आजादी के ठीक पहले, यानी 1947 के दौर में भारत के पास कितना सोना था, इसका कोई एक सटीक आंकड़ा नहीं है, क्योंकि सोना दो रूपों में था:
* **सरकारी रिजर्व:** भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास विदेशी मुद्रा और सोने का रिजर्व था।
* **रियासतों और जनता का सोना:** भारत के राजा-महाराजाओं (जैसे हैदराबाद के निजाम या पटियाला के राजा) और आम जनता के पास आभूषणों और सिक्कों के रूप में भारी मात्रा में सोना था।
> **एक रोचक तथ्य:** सन 1947 में भारत में सोने की कीमत लगभग **₹88.62 प्रति 10 ग्राम** (तौला) थी। आज के मुकाबले यह भले ही बहुत कम लगे, लेकिन उस समय के वेतन और अर्थव्यवस्था के हिसाब से यह बहुत मूल्यवान था।
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### 2. अंग्रेजों ने सोने को "खर्चे" में कैसे दिखाया?
अंग्रेज भारत से सीधे बक्से में सोना भरकर चोरी-छिपे नहीं ले जाते थे, बल्कि उन्होंने इसके लिए एक कानूनी और प्रशासनिक ढांचा तैयार किया था। इसे उन्होंने निम्नलिखित तरीकों से "खर्चे" और "वैध लेनदेन" के रूप में दिखाया:
* **होम चार्जेस (Home Charges):** ब्रिटिश सरकार भारत को चलाने के नाम पर ब्रिटेन में बैठे अपने अधिकारियों की सैलरी, पेंशन, और लंदन के इंडिया ऑफिस का खर्च भारत के राजस्व (Tax) से वसूलती थी। इसे कागजों पर "प्रशासनिक खर्च" दिखाया जाता था।
* **युद्ध का खर्च (War Expenses):** प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों, अनाज और धन का खुलकर इस्तेमाल किया। उन्होंने इसे "साम्राज्य की सुरक्षा का खर्च" बताया।
* **स्टर्लिंग बैलेंस (Sterling Balances):** दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने भारत से भारी मात्रा में सामान और सेवाएं लीं। इसके बदले उन्होंने भारत को नकद या सोना देने के बजाय लंदन के बैंक में डिजिटल एंट्री के रूप में "स्टर्लिंग बैलेंस" (एक तरह का कर्ज जो ब्रिटेन पर भारत का था) जमा कर दिया। आजादी के समय यह राशि लगभग 1,300 मिलियन पाउंड थी।
### 3. क्या अंग्रेज सारा खजाना "खा गए" या भारत को कुछ मिला?
यह कहना पूरी तरह गलत नहीं होगा कि अंग्रेजों ने भारत को आर्थिक रूप से खोखला कर दिया। लेकिन जब 1947 में देश आजाद हुआ और भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब सारा खजाना अंग्रेज नहीं ले जा सके थे:
| श्रेणी | आजादी के बाद क्या हुआ? |
|---|---|
| **RBI का रिजर्व** | जो सोना और विदेशी मुद्रा रिजर्व बैंक के पास थी, वह भारत सरकार के पास ही रही। |
| **स्टर्लिंग बैलेंस** | आजादी के बाद भारत ने ब्रिटेन से यह पैसा धीरे-धीरे वापस लिया, जिससे देश के शुरुआती विकास और पंचवर्षीय योजनाओं में मदद मिली। |
| **बंटवारा** | भारत के पास मौजूद कुल नकदी और खजाने का **82.5% हिस्सा भारत को** और **17.5% हिस्सा पाकिस्तान को** दिया गया था। |
### निष्कर्ष
अंग्रेजों ने लगभग दो सदियों तक भारत के सोने, टैक्स और संसाधनों का इस्तेमाल अपने देश को अमीर बनाने और विश्व युद्ध लड़ने में किया। उन्होंने इसे "व्यापार घाटा", "प्रशासनिक खर्च" और "सुरक्षा लागत" जैसे कानूनी और तकनीकी बहीखातों (Accounts) में दिखाकर वैध रूप दिया। हालांकि, आजादी के समय जो सरकारी खजाना और केंद्रीय बैंक (RBI) के अधिकार में सोना था, वह भारत के पास सुरक्षित रहा और उसी से स्वतंत्र भारत की अर्थव्यवस्था की शुरुआत हुई।
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