'डिजिटल रीच' (Digital Reach) और आधुनिक तकनीक ने जहां एक तरफ शिक्षा को दूर-दराज के गांवों तक पहुंचाया है, वहीं दूसरी तरफ इसका एक काला सच भी सामने आया है। जिसे आज समाज में **'कोचिंग माफिया'** या शिक्षा के व्यवसायीकरण का नाम दिया जा रहा है, वे इस डिजिटल पहुंच का इस्तेमाल छात्रों और अभिभावकों पर मानसिक और आर्थिक दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं।
आइए समझते हैं कि डिजिटल रीच को बढ़ाकर ये कोचिंग संस्थान वास्तव में क्या खेल खेल रहे हैं:
## 1. डर और 'फोमो' (FOMO) का कारोबार
डिजिटल विज्ञापनों (यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक) के जरिए माता-पिता और बच्चों के मन में एक डर पैदा किया जाता है—**"अगर आपने कक्षा 6वीं या 8वीं से ही आईआईटी (IIT) या नीट (NEET) की तैयारी शुरू नहीं की, तो आपका बच्चा रेस में पीछे छूट जाएगा।"**
* इसे तकनीकी भाषा में **FOMO (Fear Of Missing Out)** कहते हैं।
* इस डर को डिजिटल रीच के जरिए हर घर के मोबाइल तक पहुंचाकर करोड़ों रुपये का मार्केट खड़ा किया जा रहा है।
## 2. 'सक्सेस' का भ्रामक प्रचार (Misleading Marketing)
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर केवल उन 0.1% बच्चों की तस्वीरें और इंटरव्यू दिखाए जाते हैं जो परीक्षा में टॉप करते हैं।
* **हकीकत:** उन लाखों बच्चों की कहानी छुपा ली जाती है जो डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं या असफल हो रहे हैं।
* **रैंक की खरीद-फरोख्त:** डिजिटल रीच का इस्तेमाल करके एक ही टॉपर की फोटो 4 अलग-अलग कोचिंग संस्थान अपने विज्ञापनों में लगाते हैं, जिससे छात्र भ्रमित हो जाते हैं कि असली पढ़ाई कहां होती है।
## 3. एल्गोरिदम और डेटा का खेल (Targeted Advertising)
ये कोचिंग सेंटर और एड-टेक कंपनियां आधुनिक डेटा एनालिसिस का उपयोग करती हैं।
* यदि किसी छात्र ने गूगल पर किसी परीक्षा के बारे में एक बार भी सर्च किया, तो सोशल मीडिया पर उसे चौबीसों घंटे सिर्फ उसी कोचिंग के कोर्सेस और 'डिस्काउंट ऑफर्स' के विज्ञापन दिखने लगते हैं।
* बच्चों के मनोविज्ञान (Psychology) को समझकर उन्हें इस तरह जाल में फंसाया जाता है कि वे कोर्स खरीदने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
## 4. अंधाधुंध फीस और लोन का जाल (The Loan Trap)
डिजिटल कोर्सेस को "सस्ता" या "आसान किश्तों (EMIs)" पर देने का दावा किया जाता है। कई बार कोचिंग माफिया थर्ड-पार्टी फाइनेंस कंपनियों के साथ मिलकर अभिभावकों को बिना पूरी जानकारी दिए **लोन के जाल** में फंसा देते हैं। बाद में कोर्स पसंद न आने पर भी रिफंड (पैसा वापस) मिलना नामुमकिन हो जाता है।
## 5. मानसिक दबाव और संवेदनशीलता की कमी
डिजिटल रीच बढ़ने से पढ़ाई 24 घंटे की हो गई है। बच्चे रात-रात भर ऑनलाइन क्लासेस और टेस्ट सीरीज में उलझे रहते हैं। इन प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की काउंसिलिंग (Mental Health Support) का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं होता। वे केवल एक 'यूजर' या 'सब्सक्राइबर' बनकर रह जाते हैं, जिससे उनका मानसिक तनाव और अकेलापन चरम पर पहुंच जाता है।
## क्या है सरकार और कानून का रुख?
इस कोचिंग माफिया और डिजिटल भ्रामक प्रचार पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने सख्त कदम उठाने शुरू किए हैं:
* **नया कोचिंग रेगुलेशन:** अब 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का कोचिंग में सीधा रजिस्ट्रेशन नहीं किया जा सकता।
* **भ्रामक विज्ञापनों पर रोक:** सरकार ने '100% सिलेक्शन की गारंटी' जैसे भ्रामक वादे करने वाले विज्ञापनों पर भारी जुर्माने का प्रावधान किया है।
> **अंतिम बात:** डिजिटल तकनीक बुरी नहीं है, लेकिन कोचिंग संस्थानों ने इसे शिक्षा देने के बजाय **'मुनाफा कमाने की मशीन'** बना लिया है। आज जरूरत इस बात की है कि छात्र और अभिभावक विज्ञापनों की चमक-दमक से दूर रहकर अपनी वास्तविक क्षमता के अनुसार फैसला लें।
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क्या आपको भी लगता है कि सोशल मीडिया पर आने वाले कोचिंग के विज्ञापन छात्रों को जरूरत से ज्यादा तनाव दे रहे हैं?
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