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चाइल्ड लेबर के इस नए डिजिटल रूप के बच्चों पर प्रभाव से सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी नए कानून बनाने चाहिए ?
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सोशल मीडिया के इस दौर में **'डिजिटल चाइल्ड लेबर' (Digital Child Labor)** या **'किडफ्लुएंसिंग' (Kidfluencing)** एक ऐसी सच्चाई बन चुका है, जिसके लिए हमारे मौजूदा कानून (जैसे बाल श्रम निषेध कानून) पूरी तरह तैयार नहीं हैं।
पारंपरिक बाल श्रम में बच्चा किसी फैक्ट्री या दुकान में काम करता है, लेकिन इस डिजिटल बाल श्रम में बच्चा अपने ही घर में, अपने ही माता-पिता के कैमरे के सामने घंटों 'काम' करता है। चूंकि इसमें कोई बाहरी नियोक्ता (Employer) नहीं होता, इसलिए यह शोषण अक्सर 'पारिवारिक मनोरंजन' के नाम पर छिप जाता है।
इस गंभीर खतरे से निपटने के लिए सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मिलकर तुरंत सख्त कदम उठाने की जरूरत है:
## 1. सरकार को किन नए कानूनों की जरूरत है?
दुनिया के कुछ देशों (जैसे फ्रांस और अमेरिका के इलिनोइस राज्य) ने इस दिशा में कानून बनाने शुरू कर दिए हैं। भारत सरकार को भी निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
* **कमाई पर बच्चों का अधिकार (Coogan Law की तर्ज पर):** एक ऐसा कानून होना चाहिए जिसके तहत बच्चों के नाम पर होने वाली सोशल मीडिया कमाई का एक बड़ा हिस्सा (उदा. 70-80%) एक **'ब्लॉक ट्रस्ट अकाउंट'** में सुरक्षित रखा जाए। इसे बच्चा 18 वर्ष का होने पर ही निकाल सके। इससे माता-पिता द्वारा बच्चों को 'कमाई का जरिया' बनाने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।
* **काम के घंटों की सीमा तय हो:** जैसे बाल श्रम कानूनों में बच्चों के काम के घंटे तय होते हैं, वैसे ही स्क्रीन के सामने शूटिंग, रील्स बनाने या लाइव स्ट्रीमिंग के लिए भी समय सीमा (जैसे हफ्ते में अधिकतम 4-5 घंटे) तय होनी चाहिए, ताकि उनकी पढ़ाई और खेलने का समय प्रभावित न हो।
* **'राइट टू बी फॉरगॉटन' (भूल जाने का अधिकार):** कानूनन बच्चों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि 18 साल का होने पर वे इंटरनेट से अपने बचपन के उन सभी वीडियो या तस्वीरों को हटाने की मांग कर सकें, जो उनकी सहमति के बिना उनके माता-पिता ने पोस्ट किए थे।
## 2. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (YouTube, Instagram, TikTok) की जिम्मेदारी
प्लेटफॉर्म्स केवल यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि उनकी पॉलिसी 13 साल से कम उम्र के बच्चों को अकाउंट खोलने की अनुमति नहीं देती, क्योंकि ज्यादातर अकाउंट माता-पिता के नाम पर ही चलाए जाते हैं। उन्हें ये बदलाव करने होंगे:
* **एल्गोरिदम में बदलाव:** जो वीडियो बच्चों का मानसिक या शारीरिक शोषण करते हैं, या उन्हें वयस्कों की तरह पेश करते हैं, उनके एल्गोरिदम रीच (Reach) को तुरंत ब्लॉक किया जाए।
* **अनिवार्य चाइल्ड-प्रोटेक्शन मोनेटाइजेशन:** जिन चैनल्स या प्रोफाइल्स में मुख्य कंटेंट क्रिएटर बच्चे हैं, उनके मोनेटाइजेशन (कमाई) के लिए सरकार द्वारा प्रमाणित ट्रस्ट अकाउंट को जोड़ना अनिवार्य किया जाए।
* **कमेंट सेक्शन पर सख्त नियंत्रण:** बच्चों वाले वीडियो के कमेंट सेक्शन को डिफ़ॉल्ट रूप से बंद (Disable) या अत्यधिक मॉडरेट किया जाना चाहिए, ताकि बच्चे साइबर बुलिंग, ट्रोलिंग और पीडोफाइल (बाल यौन शोषक) तत्वों की गंदी नजरों से बच सकें।
## 3. कानून के साथ सामाजिक जागरूकता भी जरूरी
केवल कानून बना देने से यह समस्या तब तक हल नहीं होगी, जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी।
> **एक कड़वी सच्चाई:** हम एक समाज के रूप में भी इसके जिम्मेदार हैं। जब हम किसी छोटे बच्चे को रील पर वयस्कों वाले गानों पर थिरकते देखते हैं, तो हम उसे 'क्यूट' कहकर लाइक और शेयर कर देते हैं। हमारी यही 'लाइक्स' और 'व्यूज' उन माता-पिता के लालच को बढ़ावा देते हैं।
>
जब तक उपभोक्ता (Audience) के तौर पर हम ऐसे कंटेंट का बहिष्कार नहीं करेंगे और सरकार इस पर सख्त कानूनी ढांचा तैयार नहीं करेगी, तब तक मासूम बचपन इसी तरह 'व्यूज और डॉलर्स' की वेदी पर चढ़ता रहेगा।
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