भारत में गुजरती या अन्य समुदाय के जैसा आदिवासी शिक्षित समुदाय को देश राज्यों में हर क्षेत्र में नेतृत्व का मौका मिला 78 सालों में?
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भारत में पिछले 78 वर्षों के सामाजिक-राजनीतिक सफर पर नजर डालें, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि आदिवासी समुदायों (ST) और पंजाबी, गुजरती जैसे आर्थिक रूप से मजबूत समुदायों के बीच 'अवसरों की समानता' में एक बड़ी खाई रही है।
हालांकि, स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। पिछले कुछ दशकों में आदिवासी समाज ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू की है, लेकिन नेतृत्व के स्तर पर वह अभी भी एक लंबी यात्रा के बीच में हैं।
### नेतृत्व के विभिन्न क्षेत्रों में स्थिति
**1. राजनीतिक नेतृत्व (Political Leadership)**
राजनीति वह एकमात्र क्षेत्र है जहाँ आदिवासियों को **संवैधानिक आरक्षण** के कारण नेतृत्व का सबसे स्पष्ट मौका मिला है।
* **उच्चतम पद:** भारत को **द्रौपदी मुर्मू** के रूप में पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिली हैं। यह एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।
* **राज्य स्तर:** झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में आदिवासी मुख्यमंत्री (जैसे हेमंत सोरेन, विष्णु देव साय) रहे हैं।
* **चुनौती:** अक्सर यह देखा गया है कि आरक्षित सीटों से जीतने वाले नेता अपनी पार्टी के 'हाईकमान' के निर्देशों तक सीमित रह जाते हैं, जिससे स्वतंत्र सामुदायिक नेतृत्व विकसित होने में बाधा आती है।
**2. शिक्षा और नौकरशाही (Bureaucracy)**
शिक्षित आदिवासी युवाओं ने UPSC और राज्य सेवाओं के माध्यम से प्रशासन में जगह बनाई है।
* देश में कई प्रमुख आदिवासी IAS और IPS अधिकारी हैं जो नीति निर्धारण में भूमिका निभा रहे हैं।
* **चुनौती:** उच्च शिक्षा (IITs, IIMs) में नामांकन बढ़ा है, लेकिन अभी भी ड्रॉपआउट रेट अधिक है और निजी क्षेत्र (Private Sector) के नेतृत्व में आदिवासियों की भागीदारी न के बराबर है।
**3. आर्थिक और व्यापारिक नेतृत्व (Economic Leadership)**
यहाँ पंजाबी या मारवाड़ी समुदायों की तुलना में आदिवासी समुदाय काफी पीछे हैं।
* पंजाबी समुदाय ने विभाजन के बाद उद्यमिता (Entrepreneurship) के जरिए अपनी पहचान बनाई।
* आदिवासी समाज की आर्थिक व्यवस्था अक्सर जल, जंगल और जमीन से जुड़ी रही है। कॉर्पोरेट जगत या बड़े व्यापारिक घरानों में आदिवासी 'बिजनेस लीडर्स' की कमी एक बड़ी सच्चाई है।
### तुलनात्मक अंतर के प्रमुख कारण
| कारक | पंजाबी/अन्य विकसित समुदाय | आदिवासी समुदाय |
|---|---|---|
| **प्रारंभिक पूंजी** | व्यापारिक पृष्ठभूमि और शहरी जुड़ाव। | संसाधनों का विस्थापन और गरीबी। |
| **शिक्षा की सुगमता** | शहरों में बेहतर शिक्षण संस्थानों तक पहुंच। | सुदूर क्षेत्रों में स्कूलों की कमी और भाषाई बाधा। |
| **सामाजिक नेटवर्किंग** | मजबूत 'लॉबिंग' और व्यापारिक नेटवर्क। | मुख्यधारा से भौगोलिक और सामाजिक अलगाव। |
| **प्रतिनिधित्व** | मीडिया, न्यायपालिका और व्यापार में मजबूत पकड़। | मुख्य रूप से केवल विधायी (Legislative) पदों तक सीमित। |
### निष्कर्ष: क्या 78 सालों में न्याय हुआ?
निष्कर्षतः, **नेतृत्व का मौका मिला तो है, लेकिन वह 'समान' नहीं रहा है।** 78 सालों में हमने आदिवासी समुदाय को हाशिए से निकालकर राष्ट्रपति भवन तक पहुँचते देखा है, जो लोकतंत्र की जीत है। लेकिन जब हम **न्यायपालिका, मीडिया के संपादकीय बोर्ड और निजी क्षेत्र के CEO** की बात करते हैं, तो वहां अभी भी एक 'ग्लास सीलिंग' (अदृश्य दीवार) मौजूद है जिसे तोड़ना बाकी है।
आदिवासी समाज को 'उपभोक्ता' या 'वोट बैंक' की जगह 'निर्णायक नेतृत्व' के रूप में स्वीकार करने की प्रक्रिया अभी भी धीमी है।
क्या आपको लगता है कि केवल आरक्षण के माध्यम से ही इस नेतृत्व की कमी को भरा जा सकता है, या हमें निजी क्षेत्र में भी सामाजिक विविधता की आवश्यकता है?
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