मूल निवासी शब्द से यू.एन.ओ के सदस्य देश क्यों डरते हैं किन देशों ने मूल निवासी शब्द अपने संविधान में जोड़ा है ?
संयुक्त राष्ट्र (UNO) और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में **'मूल निवासी' (Indigenous Peoples)** शब्द अत्यंत संवेदनशील और विवादास्पद रहा है। इसके पीछे ऐतिहासिक, कानूनी और भू-राजनीतिक कारण हैं।
यहाँ इसका विस्तृत विश्लेषण दिया गया है:
### 1. सदस्य देश 'मूल निवासी' शब्द से क्यों डरते हैं?
दुनिया के कई देश, विशेषकर वे जहाँ उपनिवेशवाद (Colonialism) रहा है, इस शब्द को अपनाने से कतराते हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
* **आत्मनिर्णय का अधिकार (Right to Self-Determination):** UN के घोषणापत्र के अनुसार, मूल निवासियों को अपनी जमीन, संसाधनों और राजनीतिक स्थिति पर निर्णय लेने का अधिकार है। सरकारों को डर है कि इससे 'अलग राज्य' की मांग उठ सकती है।
* **संसाधनों पर नियंत्रण:** यदि किसी समुदाय को 'मूल निवासी' मान लिया जाता है, तो उस क्षेत्र के जल, जंगल और जमीन पर उनका पहला अधिकार हो जाता है। इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सरकार के खनन या औद्योगिक प्रोजेक्ट्स में बाधा आ सकती है।
* **ऐतिहासिक मुआवजे का डर:** इस शब्द को स्वीकार करने का अर्थ है यह मानना कि अतीत में उनके साथ अन्याय हुआ है। इससे कानूनी तौर पर मुआवजे या भूमि वापसी की मांगें सशक्त हो सकती हैं।
* **संप्रभुता को चुनौती:** देशों को लगता है कि एक अलग 'स्वदेशी' पहचान राष्ट्र की अखंडता के लिए खतरा बन सकती है।
### 2. किन देशों ने इसे संविधान में जोड़ा या स्वीकार किया है?
दुनिया के कई देशों ने संघर्षों और आंदोलनों के बाद इसे संवैधानिक दर्जा दिया है:
* **बोलीविया (Bolivia):** यह दुनिया का पहला देश है जिसने अपनी पूरी राज्य संरचना को ही 'बहुराष्ट्रीय' (Plurinational) घोषित कर दिया। यहाँ के संविधान में मूल निवासियों के अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
* **कनाडा (Canada):** कनाडा के संविधान (1982) की धारा 35 स्पष्ट रूप से 'एबोरिजिनल' (Aboriginal) लोगों के अधिकारों को मान्यता और संरक्षण देती है।
* **ऑस्ट्रेलिया (Australia):** यहाँ के संविधान में सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन कई कानूनों और ऐतिहासिक 'सॉरी' (Apology) के माध्यम से उनकी स्थिति को स्वीकार किया गया है।
* **न्यूजीलैंड (New Zealand):** यहाँ 'वेटांगी की संधि' (Treaty of Waitangi) को शासन व्यवस्था का आधार माना जाता है, जो माओरी (Maori) समुदाय को विशेष अधिकार देती है।
* **अन्य:** नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड ने अपने यहाँ के 'सामी' (Sami) लोगों के लिए विशेष संसद और अधिकार सुनिश्चित किए हैं।
### 3. भारत की क्या स्थिति है?
भारत का रुख इस मामले में बहुत स्पष्ट लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग है:
* **'आदिवासी' बनाम 'मूल निवासी':** भारत सरकार का तर्क है कि **"पूरा भारत ही मूल निवासियों का है।"** सरकार का मानना है कि भारत में बाहर से आए लोगों और यहाँ के लोगों के बीच की रेखा इतनी धुंधली है कि किसी एक विशेष समूह को 'मूल निवासी' (Indigenous) और अन्य को 'बाहरी' नहीं कहा जा सकता।
* **संवैधानिक स्थिति:** भारतीय संविधान में 'मूल निवासी' शब्द के बजाय **'अनुसूचित जनजाति' (Scheduled Tribes)** शब्द का प्रयोग किया गया है।
* **अनुच्छेद और अनुसूचियां:** * **5वीं और 6वीं अनुसूची:** ये जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्तता और विशेष प्रशासन का अधिकार देती हैं।
* **अनुच्छेद 342:** यह राष्ट्रपति को जनजातियों को अधिसूचित करने की शक्ति देता है।
* **अंतरराष्ट्रीय स्टैंड:** भारत ने 2007 में **UNDRIP** (United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples) के पक्ष में मतदान तो किया, लेकिन इस शर्त के साथ कि भारत की सभी जनजातियाँ 'अनुसूचित जनजाति' की श्रेणी में आती हैं और भारत में 'स्वतंत्रता के बाद' कोई स्वदेशी बनाम विदेशी का भेदभाव नहीं है।
### निष्कर्ष
जहाँ पश्चिमी देशों (जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया) में 'मूल निवासी' और 'आक्रमणकारी/प्रवासी' के बीच स्पष्ट अंतर है, वहीं भारत जैसे देशों में यह एक जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना है। इसी जटिलता के कारण भारत 'मूल निवासी' शब्द के राजनीतिक उपयोग से बचता है, जबकि 'आदिवासी' अधिकारों के लिए अपने घरेलू कानूनों को मजबूत मानता है।
क्या आप भारत में आदिवासियों के लिए बने विशेष कानूनी प्रावधानों (जैसे PESA कानून) के बारे में अधिक विस्तार से जानना चाहेंगे?
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