महिलाएं है तो समाज है ग्रहणियों की बढ़ती आत्महत्या आंकड़े बताते हे, वहीं वर्ष 1975 में आइसलैंड की ग्रहणीयों का धरना क्या दर्शाता है ?

एक बहुत गहरी चिंता और ऐतिहासिक सच्चाई दोनों छिपी हैं। यह सच है कि समाज की धुरी महिलाएं हैं, लेकिन जब घर को संभालने वाली 'गृहिणियां' (Homemakers) हताश होकर आत्महत्या जैसा कदम उठाती हैं, तो यह समाज की संरचना पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। आपने जो **1975 के आइसलैंड के धरने** का जिक्र किया, वह इतिहास की एक ऐसी घटना है जिसने पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि घर के "न दिखने वाले काम" की कीमत क्या है। ### 1975 में आइसलैंड की महिलाओं की हड़ताल (The "Women's Day Off") 24 अक्टूबर 1975 को आइसलैंड की **90% महिलाओं** ने एक साथ काम बंद करने का फैसला किया। इसमें केवल दफ्तर जाने वाली महिलाएं ही नहीं, बल्कि **घर संभालने वाली महिलाएं (Homemakers)** भी शामिल थीं। **यह धरना क्या दर्शाता है?** * **अदृश्य श्रम की पहचान:** उस दिन महिलाओं ने न खाना बनाया, न बच्चों को संभाला और न ही घर की सफाई की। इसका नतीजा यह हुआ कि पूरा देश ठप हो गया। इससे समाज को समझ आया कि जिसे हम "घर का काम" कहकर मामूली समझते हैं, वह वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था और स्थिरता की असली नींव है। * **समान अधिकार की मांग:** यह धरना केवल वेतन के लिए नहीं था, बल्कि इस सम्मान के लिए था कि एक महिला चाहे घर के अंदर काम करे या बाहर, उसका योगदान पुरुष के बराबर है। * **बदलाव की ताकत:** इस हड़ताल के ठीक एक साल बाद आइसलैंड में समान अधिकार का कानून पास हुआ और आगे चलकर देश को दुनिया की पहली महिला राष्ट्रपति (विग्डिस फिनबोगाडोटिर) मिलीं। ### भारत में गृहिणियों की आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े: एक कड़वी हकीकत NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) के आंकड़े वाकई डराने वाले हैं, जो बताते हैं कि भारत में आत्महत्या करने वाली महिलाओं में एक बड़ा हिस्सा गृहिणियों का है। इसके पीछे के मुख्य कारण वही हैं जिन्हें आइसलैंड की महिलाओं ने 1975 में चुनौती दी थी: * **मानसिक अकेलापन और 'बर्नआउट':** 24/7 बिना किसी छुट्टी के काम करना और उसके बदले में कोई सराहना या 'थैंक यू' न मिलना मानसिक तनाव पैदा करता है। * **आर्थिक निर्भरता:** अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना उनके आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचाता है। * **सामाजिक दबाव:** "महिला है तो उसे सहना ही होगा" वाली सोच उन्हें अपनी परेशानी साझा करने से रोकती है। * **पहचान का संकट:** अक्सर महिलाएं परिवार की देखभाल में अपनी खुद की इच्छाओं, हॉबी और पहचान को खो देती हैं। ### निष्कर्ष आइसलैंड का उदाहरण हमें सिखाता है कि **"महिलाएं हैं तो समाज है"** सिर्फ कहने की बात नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके श्रम का सम्मान और उनके मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करना समाज की जिम्मेदारी है। जब तक हम घर के काम को 'सिर्फ एक औरत का फर्ज' मानेंगे और उसे आर्थिक या सामाजिक मूल्य नहीं देंगे, तब तक उनकी हताशा कम नहीं होगी। आइसलैंड की महिलाओं ने दिखाया था कि अगर वे एक दिन रुक जाएं, तो दुनिया रुक जाती है। आज हमें उस धरने से यह सीखने की जरूरत है कि हम अपने घर की महिलाओं को वह **महत्व, आराम और सम्मान** दें, जिसकी वे हकदार हैं। क्या आपको लगता है कि हमारे समाज में आज भी घर के काम को "काम" माना जाता है?

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