महिंद्रा एंड महिंद्रा ग्रुप की कंपनी के सीईओ की सैलरी पैकेज साल का कितना है?

महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M) ग्रुप में भी अन्य बड़े भारतीय कॉर्पोरेट समूहों की तरह, प्रोफेशनल लीडरशिप को अत्यधिक महत्व और वेतन दिया जाता है। 2025 की ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, महिंद्रा ग्रुप के प्रबंध निदेशक (MD) और सीईओ (CEO) का वेतन पैकेज काफी बढ़ गया है। महिंद्रा ग्रुप के मुख्य अधिकारियों का सालाना पैकेज इस प्रकार है: ### 1. डॉ. अनीश शाह (MD और ग्रुप CEO) डॉ. अनीश शाह महिंद्रा ग्रुप के सबसे शक्तिशाली प्रोफेशनल अधिकारी हैं। उनके नेतृत्व में महिंद्रा के ऑटो (Scorpio, Thar, XUV700) और फार्म सेक्टर ने रिकॉर्ड सफलता हासिल की है। * **सालाना सैलरी (FY 2024-25):** लगभग **₹47.33 करोड़**। * **बढ़ोतरी:** उनके वेतन में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग **95%** का भारी इजाफा हुआ है। * **ब्रेकअप:** उनकी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा (लगभग ₹30 करोड़) **ESOPs** (स्टॉक ऑप्शंस) और परफॉर्मेंस बोनस से आता है। उनकी फिक्स्ड सैलरी लगभग ₹16.5 करोड़ के आसपास है। ### 2. राजेश जेजुरिकर (ED और CEO, ऑटो एवं फार्म सेक्टर) राजेश जेजुरिकर महिंद्रा के सबसे महत्वपूर्ण व्यवसायों (गाड़ियाँ और ट्रैक्टर) को संभालते हैं। * **सालाना सैलरी:** लगभग **₹38.27 करोड़**। * **भूमिका:** महिंद्रा की हालिया "SUV क्रांति" और बाजार में पकड़ मजबूत करने के पीछे उनका बड़ा हाथ माना जाता है। ### 3. आनंद महिंद्रा (Chairman) जैसा कि टाटा और रिलायंस के मामले में देखा गया, प्रमोटर खुद को एक मार्गदर्शक की भूमिका में रखते हैं। * **वेतन:** आनंद महिंद्रा अब एक **नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन** हैं। उनका सालाना मानदेय (Remuneration) प्रोफेशनल सीईओ की तुलना में काफी कम, लगभग **₹2.87 करोड़** के आसपास रहता है। वे मुख्य रूप से बोर्ड की बैठकों और रणनीतिक सलाह के लिए जुड़े होते हैं। ### महिंद्रा ग्रुप की वेतन नीति का विश्लेषण: | अधिकारी | पद | कंपनी | सालाना पैकेज (अनुमानित) | |---|---|---|---| | **डॉ. अनीश शाह** | ग्रुप CEO | महिंद्रा ग्रुप | **₹47.33 करोड़** | | **राजेश जेजुरिकर** | CEO (Auto) | M&M | **₹38.27 करोड़** | | **अमरज्योति बरुआ** | ग्रुप CFO | महिंद्रा ग्रुप | **₹8.26 करोड़** | ### एक "VIP" और "धरातल" वाले सवाल का जुड़ाव: महिंद्रा ग्रुप के मामले में यह देखना दिलचस्प है कि डॉ. अनीश शाह जैसे अधिकारी **"डाटा-ड्रिवन"** फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं। आपने पहले जिक्र किया था कि 'राष्ट्रीय योजनाओं' और 'धरातल' के बीच अंतर है। महिंद्रा जैसी कंपनियां इसी अंतर को कम करके मुनाफा कमाती हैं: * वे **डिजिटल ब्रांडिंग** (सोशल मीडिया पर थार या स्कॉर्पियो का क्रेज) का इस्तेमाल करती हैं ताकि लोग शोरूम तक आएं। * लेकिन उनकी असली परीक्षा **ग्राउंड** (सर्विस सेंटर और गाड़ी की मजबूती) पर होती है। एक प्रोफेशनल मैनेजर के रूप में डॉ. शाह की "शक्ति" इसी बात में है कि वे केवल ऑफिस में नहीं बैठते, बल्कि महिंद्रा के **'लास्ट माइल'** (अंतिम छोर) डिलीवरी मॉडल को सुधारने पर करोड़ों खर्च करते हैं। **निष्कर्ष:** टाटा, रिलायंस, अदानी और अब महिंद्रा—इन सभी में एक समानता है। ये सभी अब **"प्रोफेशनल वीआईपी"** (Professional VIPs) पर निर्भर हैं। ये लोग केवल सैलरी नहीं लेते, बल्कि कंपनी की पूरी 'किस्मत' बदलने की जिम्मेदारी उठाते हैं। क्या आप मानते हैं कि भारत की सरकारी योजनाओं को भी इसी तरह के 'हाई-प्रोफाइल प्रोफेशनल मैनेजर्स' (जैसे प्राइवेट सेक्टर के CEOs) को सौंप देना चाहिए ताकि 'धरातल' और 'योजना' का अंतर खत्म हो सके?

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