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मध्यप्रदेश के श्योपुर जैसी घटनाएं हृदयविदारक हैं। एक नन्ही जान को इस तरह असुरक्षित छोड़ देना न केवल एक अपराध है, बल्कि हमारी सामाजिक विफलता का भी प्रतीक है।
जब ये बच्चे विदेशों में गोद लिए जाते हैं,
तो बड़े होकर अपनी जड़ों (Biological Parents) की तलाश करना उनकी स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है। इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए हमें बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा:
### 1. 'पालना' (Safe Surrender) योजना का प्रचार
अक्सर लोग लोक-लाज या कानूनी डर से बच्चे को झाड़ियों या हाईवे पर छोड़ देते हैं, जिससे बच्चे की जान को खतरा होता है।
* **समाधान:** सरकार ने **'पालना' योजना** शुरू की है, जहाँ अस्पतालों या अनाथालयों के बाहर पालने रखे जाते हैं। यहाँ बच्चा छोड़ने पर कोई सवाल नहीं पूछा जाता और न ही पुलिस केस होता है। इसका व्यापक प्रचार होना चाहिए ताकि "परित्याग" (Abandonment) के बजाय "सुरक्षित समर्पण" (Safe Surrender) बढ़े।
### 2. सामाजिक कलंक (Social Stigma) को खत्म करना
ज्यादातर मामलों में बच्चा छोड़ने की वजह 'बिन ब्याही मां' या 'गरीबी' होती है।
* **समाधान:** समाज को संवेदनशील बनाना होगा ताकि कठिन परिस्थितियों में फंसी महिलाएं डर के मारे बच्चे को न फेंकें। जब तक समाज का नजरिया नहीं बदलेगा, हाईवे पर बच्चे मिलते रहेंगे।
### 3. सुलभ और पारदर्शी गोद लेने की प्रक्रिया (Adoption)
भारत में कानूनी रूप से बच्चा गोद लेना एक लंबी प्रक्रिया है, जिसके कारण लोग हतोत्साहित होते हैं।
* **समाधान:** **CARA (Central Adoption Resource Authority)** के माध्यम से घरेलू गोद लेने की प्रक्रिया को और अधिक सरल और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अगर देश के भीतर ही बच्चों को जल्दी परिवार मिल जाए, तो उनके विदेश जाने और फिर सालों बाद पहचान के संकट से जूझने की संभावना कम हो जाएगी।
### 4. निगरानी और डेटाबेस
* **समाधान:** ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 'आशा' कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण अनिवार्य और ट्रैक होना चाहिए। यदि कोई बच्चा अचानक गायब होता है, तो तुरंत जवाबदेही तय होनी चाहिए।
### जैविक माता-पिता की तलाश को कैसे समझें?
विदेशी माता-पिता द्वारा गोद लिए गए बच्चे जब वापस आते हैं, तो वे अक्सर **"Identity Crisis"** से गुजर रहे होते हैं। इसे रोकने का तरीका उन्हें रोकना नहीं, बल्कि ऐसी स्थितियां पैदा करना है कि बच्चा अनाथ ही न हो:
* **आर्थिक सहायता:** जो परिवार गरीबी के कारण बच्चा छोड़ रहे हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं (जैसे स्पॉन्सरशिप प्रोग्राम) से जोड़ना चाहिए ताकि वे बच्चे को खुद पाल सकें।
* **कौंसलिंग:** संकट में फंसी माताओं को कानूनी और मनोवैज्ञानिक सहायता देना।
**निष्कर्ष:**
हाईवे पर मासूमों का मिलना बंद तब होगा जब "मजबूरी" को "मदद" मिल जाएगी। कानून से ज्यादा हमें **सामाजिक जागरूकता** और **सुरक्षित समर्पण केंद्रों** की जानकारी घर-घर तक पहुँचाने की जरूरत है।
क्या आपको लगता है कि स्थानीय प्रशासन और पंचायतों को ऐसे मामलों में सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए?
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