पहाडी राज्यों विशेष(उत्तराखंड हिमाचल प्रदेश और उत्तर पूर्व राज्य) में एनबीएफसी या एस.एच.जी द्वारा व्यापारिक लोन के नाम कैसे पहाडी लोगों लोन डिफॉल्टर, कर्ज में डूबते जा रहे हैं के आंकड़े?

पहाड़ी राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर) में NBFCs (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां) और SHGs (स्वयं सहायता समूह) के माध्यम से लोन डिफॉल्ट और कर्ज के जाल (Debt Trap) की स्थिति हाल के वर्षों में चिंताजनक हुई है। आधिकारिक आंकड़ों और ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर इस स्थिति का विश्लेषण नीचे दिया गया है: 1. लोन डिफॉल्ट के चौंकाने वाले आंकड़े (2024-25) माइक्रोफाइनेंस सेक्टर की रिपोर्टों (Sa-Dhan Bharat Microfinance Report 2025) के अनुसार, छोटे लोन के पुनर्भुगतान में भारी गिरावट आई है: * NPA में उछाल: पूरे भारत में माइक्रोफाइनेंस संस्थानों का Gross NPA मार्च 2024 के 8.8% से बढ़कर मार्च 2025 तक लगभग 16% हो गया है। * देरी से भुगतान (PAR 30+): 30 दिनों से अधिक की देरी वाले लोन (Portfolio at Risk) 2.1% से बढ़कर 6.2% हो गए हैं। * पहाड़ी राज्यों की स्थिति: हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों में प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, भूस्खलन) के कारण आय के स्रोत प्रभावित होने से डिफॉल्ट रेट में 12-15% की वृद्धि देखी गई है। 2. लोग कर्ज के जाल में कैसे फंस रहे हैं? नीचे दिए गए चित्र के माध्यम से समझिए कि कैसे एक छोटा लोन 'कर्ज के जाल' में बदल जाता है: * मल्टीपल लेंडिंग (Multiple Lending): अक्सर एक ही व्यक्ति 3 से 4 अलग-अलग NBFCs या समूहों से लोन ले लेता है। एक की किस्त चुकाने के लिए दूसरे से लोन लेना "डेब्ट ट्रैप" की शुरुआत है। * ऊंची ब्याज दरें: NBFCs की प्रभावी ब्याज दरें (Effective Interest Rates) अक्सर 22% से 26% तक होती हैं, जो व्यापारिक लाभ से कहीं अधिक होती हैं। * व्यापारिक लोन बनाम उपभोग: लोन 'बिज़नेस' के नाम पर लिया जाता है, लेकिन अक्सर वह घर के खर्च, बीमारी या पुरानी उधारी चुकाने में खर्च हो जाता है, जिससे आय पैदा नहीं होती। 3. प्रमुख कारण: पहाड़ी राज्यों की विशिष्ट चुनौतियां | कारण | प्रभाव | |---|---| | जलवायु जोखिम | अचानक आई बाढ़ या लैंडस्लाइड से पर्यटन और कृषि (जैसे सेब के बाग) बर्बाद होना, जिससे किश्तें रुक जाती हैं। | | सीमित बाजार | पहाड़ों में स्थानीय उत्पादों के लिए बड़ा बाजार नहीं है, जिससे लोन लेकर शुरू किया गया छोटा बिज़नेस फेल हो जाता है। | | आक्रामक वसूली | कई NBFCs के रिकवरी एजेंटों का व्यवहार और सामाजिक दबाव लोगों को मानसिक तनाव और गलत कदम उठाने पर मजबूर करता है। | 4. SHG (स्वयं सहायता समूह) की भूमिका में बदलाव पहले SHG बचत और आपसी मदद के लिए थे, लेकिन अब कई बैंक और NBFCs इन्हें 'क्रेडिट डिलीवरी' का जरिया बना चुके हैं। * उत्तराखंड के कई जिलों में (जैसे अल्मोड़ा, पौड़ी) SHG महिलाओं पर बैंक लोन चुकाने का भारी दबाव है। * हिमाचल में सहकारी बैंकों का एनपीए (Bad Loans) भी बढ़ता जा रहा है क्योंकि ग्रामीण आय में स्थिरता नहीं है। सावधानी: यदि आप या आपके परिचित किसी NBFC से लोन ले रहे हैं, तो हमेशा 'Fair Practices Code' और 'RBI Registration' की जांच करें।

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