हर साल भारत में औसतन कितनी सेक्शन 8 कंपनियां (फाउंडेशन) दिवालिया हो रही है आंकड़ों के बारे में ?

भारत में सेक्शन 8 कंपनियां (जिन्हें हम आमतौर पर चैरिटेबल फाउंडेशन या NGO कहते हैं) भी इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के दायरे में आती हैं। हालाँकि, इनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता, फिर भी वित्तीय संकट या कर्ज न चुका पाने की स्थिति में इनके खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। सेक्शन 8 कंपनियों के दिवालिया होने के आंकड़े और उनसे जुड़ी जानकारी नीचे दी गई है: वार्षिक औसत और आंकड़े (Section 8 Companies) सरकारी आंकड़ों (IBBI) के अनुसार, सामान्य मुनाफे वाली कंपनियों की तुलना में सेक्शन 8 कंपनियों के दिवालिया होने के मामले बहुत कम होते हैं। * वार्षिक औसत: भारत में हर साल औसतन 20 से 40 सेक्शन 8 कंपनियां दिवालिया प्रक्रिया (CIRP) के लिए स्वीकार की जाती हैं। * कुल हिस्सेदारी: IBC के तहत आने वाले कुल मामलों में सेक्शन 8 कंपनियों की हिस्सेदारी 1% से भी कम है। * वर्तमान स्थिति: मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, अब तक लगभग 200-250 ऐसी फाउंडेशन/NGOs के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं। सेक्शन 8 कंपनियों के दिवालिया होने के मुख्य कारण इन कंपनियों के आंकड़े कम न होने या दिवालिया होने के पीछे ये प्रमुख कारण होते हैं: * अनुदान की कमी (Funding Gap): कई फाउंडेशन विदेशी या सरकारी ग्रांट पर निर्भर होती हैं। फंड रुकने पर वे कर्मचारियों की सैलरी या किराया (Operational Debt) नहीं चुका पातीं। * कानूनी जटिलता: NCLAT (नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल) ने 'मिलेनियम एजुकेशन फाउंडेशन' जैसे मामलों में यह स्पष्ट किया है कि लाभ न कमाने वाली संस्थाओं पर भी IBC लागू होगा यदि उन्होंने कर्ज लिया है। * संपत्ति का प्रबंधन: सेक्शन 8 कंपनियों के पास अक्सर अपनी अचल संपत्ति (जैसे स्कूल या अस्पताल की जमीन) होती है, लेकिन नकदी (Cash Flow) की कमी के कारण वे 'टेक्निकल डिफॉल्ट' का शिकार हो जाती हैं। समाधान की प्रक्रिया (विशेष नियम) एक सामान्य कंपनी और सेक्शन 8 कंपनी के दिवालिया होने में एक बड़ा अंतर है: * एसेट्स का हस्तांतरण: यदि कोई सेक्शन 8 कंपनी बंद (Liquidation) होती है, तो उसकी बची हुई संपत्ति उसके प्रमोटर्स या शेयरधारकों को नहीं दी जा सकती। * नियम: कंपनी अधिनियम की धारा 8(9) के अनुसार, बची हुई संपत्ति या तो किसी दूसरी 'समान उद्देश्य' वाली सेक्शन 8 कंपनी को दी जाएगी या सरकार के 'Insolvency and Bankruptcy Fund' में जमा होगी। > महत्वपूर्ण तथ्य: सेक्शन 8 कंपनियों में दिवालिया प्रक्रिया अक्सर 'ऑपरेशनल क्रेडिटर्स' (जैसे वेंडर या कर्मचारी) द्वारा शुरू की जाती है, न कि बैंकों द्वारा, क्योंकि ये कंपनियां बैंकों से बड़े लोन कम ही लेती हैं।

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