भारतीय न्यायपालिका पर जनता को भरोसा दिया है यह भरोसा तब पुख्ता होता है जब आत्म सुधार का रास्ता चुना जाता है?

यह कहना बिल्कुल सटीक है कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था की शक्ति उसकी इमारतों या कानूनों में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास (Public Trust) में निहित होती है। भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में, यह भरोसा तब और गहरा हो जाता है जब न्यायपालिका बाहरी दबाव के बजाय 'आत्म-सुधार' (Self-Correction) का मार्ग चुनती है। न्यायपालिका में आत्म-सुधार क्यों जरूरी है और यह कैसे भरोसे को पुख्ता करता है, इसे कुछ बिंदुओं से समझा जा सकता है: 1. कॉलेजियम सिस्टम और पारदर्शिता न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया (Collegium) को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। जब न्यायपालिका खुद आगे बढ़कर नियुक्तियों में अधिक पारदर्शिता लाने और योग्यता को प्राथमिकता देने की बात करती है, तो आम आदमी का विश्वास बढ़ता है कि सिस्टम निष्पक्ष है। 2. पेंडेंसी (लंबित मामले) का निपटारा 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। * डिजिटलीकरण: ई-कोर्ट (e-Courts) और वर्चुअल सुनवाई को अपनाना आत्म-सुधार का ही एक हिस्सा है। * फास्ट ट्रैक: जब न्यायपालिका खुद अपनी कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाती है, तो "न्याय में देरी, न्याय से वंचित रखना है" (Justice delayed is justice denied) वाली धारणा कम होती है। 3. न्यायिक जवाबदेही और आचार संहिता जब उच्च न्यायपालिका अपने ही सदस्यों के आचरण पर कड़ी नजर रखती है और आंतरिक जांच समितियों के माध्यम से भ्रष्टाचार या कदाचार के आरोपों का निपटारा करती है, तो जनता को यह संदेश जाता है कि "कानून से ऊपर कोई नहीं है", चाहे वह स्वयं जज ही क्यों न हों। आत्म-सुधार के प्रमुख स्तंभ: | स्तंभ | प्रभाव | |---|---| | क्षेत्रीय भाषा में फैसले | आम आदमी को अपनी भाषा में न्याय समझ आता है। | | लाइव स्ट्रीमिंग | अदालती कार्यवाही को जनता के सामने खोलना पारदर्शिता लाता है। | | मध्यस्थता (Mediation) | कोर्ट के बाहर विवाद सुलझाने को बढ़ावा देना सिस्टम का बोझ कम करता है। | > "न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि वह जवाबदेह नहीं है; बल्कि इसका अर्थ है कि वह केवल संविधान और सत्य के प्रति जवाबदेह है।" > भरोसा पुख्ता होने का परिणाम जब न्यायपालिका अपनी कमियों को स्वीकार करती है और उन्हें सुधारने के लिए तकनीक या नए नियमों का सहारा लेती है, तो वह एक 'सक्रिय न्यायपालिका' (Proactive Judiciary) के रूप में उभरती है। 2026 में जनहित याचिकाओं (PIL) और स्वतः संज्ञान (Suo Moto) के बढ़ते मामलों ने यह दिखाया है कि जनता अब भी अंतिम उम्मीद के रूप में अदालतों की ओर ही देखती है।

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